...तो नंगे पांव वोट डालने जाती!

    • Author, शालू यादव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बारामुला से

भारत प्रशासित कश्मीर में 25 नवंबर से चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन राज्य में चुनावों को लेकर ज़्यादा उत्साह नहीं नज़र आ रहा है. ऐसे समय में जब हज़ारों बाढ़-पीड़ितों के सिर पर ठंड से बचने के लिए छत तक नहीं है, चुनाव की घोषणा वादी के कई लोगों को रास नहीं आई है.

उनका कहना है कि जब से चुनावो की घोषणा हुई है तबसे प्रशासन का ध्यान राहतकार्य से हट कर चुनाव प्रचार में लग गया है जबकि उनकी प्राथमिकता चुनाव की बजाय अपनी जिंदगी को पटरी पर लाना है.

पढ़िए शालू यादव की पूरी रिपोर्ट

श्रीनगर-बारामुला हाईवे से सटे चिनार के पेड़ों के बीच टिन के चार टुकड़ों से बनी एक झोपड़-पट्टी में शमीमा अपने तीन बच्चों के लिए खाना पका रही है.

बाहरी तापमान दो डिग्री सेल्सियस है और ज़मीन ओस के कारण बेहद ठंडी है. झोपड़ में बिछी कालीन ओस से गीली हो चुकी है, लेकिन शमीमा और उनके बच्चे इस गीली कालीन पर ही सोने को मजबूर हैं.

कश्मीर में सितंबर में आई बाढ़ में तबाह हुए हज़ारों घरों में से एक शमीमा का घर भी था. लेकिन वो बाढ़ न सिर्फ उनके घर को निगल गई, बल्कि उनके पति की मौत का भी कारण बनी.

बाढ़ के मंज़र को याद करते हुए शमीमा बताती हैं, ‘जिस दिन सैलाब आया तो हम जान बचाकर पास वाले गांव में भागे जहां हमने कई दिन भूखे-प्यासे एक बांध के ऊपर गुज़ारे. कुछ दिनों बाद जब हम वापस आए तो देखा हमारा घर ताश के पत्तों की तरह ढह गया है. घर की ऐसी हालत देख कर मेरे पति को ऐसा सदमा लगा कि उन्हें ब्रेन हैमरेज हो गया और वो गुज़र बसे.’

उनके पति के गुज़र जाने के बाद शमीमा के पास अपने घर की मरम्मत के लिए कुछ नहीं बचा था.

बढ़ रही है चिंता

सरकारी मदद के लिए उन्होंने कई दिन इंतज़ार भी किया, लेकिन उनका कहना है कि उन दिनों उनके गांव मरीछमर्ग में सरकार या प्रशासन का नामो-निशान तक न दिखाई दिया.

कुछ एनजीओ ने चार टुकड़े टिन के दिए जिससे उन्होंने सड़क किनारे एक चारदीवारी बना ली और तब से इसी में गुज़ारा कर रही हैं.

अपने फ़िरन में कांगड़ी से गर्मी लेते हुए शमीमा ने बताया, "मैं वादी के उन लोगों में से नहीं हूं जो चुनाव का बहिष्कार करते हैं. मेरे पति कभी मतदान करने नहीं जाते थे, लेकिन मैं हमेशा वोट डालती थी. अगर सरकार ने हमें राहत मुहैया करवाई होती तो मैं नंगे पांव भी वोट डालने जाती, लेकिन इस बार मैं कतई वोट डालने नहीं जाऊंगीं."

वादी में अब धूप बस कुछ ही दिनों की मेहमान है और जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है, शमीमा और उनके बच्चों की चिंता भी बढ़ रही है.

झोपड़ में मौजूद एकमात्र कांगड़ी को सीने से लगाते हुए शमीमा कहती हैं कि ये बर्फ़बारी के दौरान तो दिन में ही ठंडी पड़ जाएगी, रात कैसे गुज़रेंगीं पता नहीं...

अगले अंक में पढ़िए दिवर गांव की नसीमा की कहानी, जिन्होंने बाढ़ के दौरान अपने परिवार के साथ दस दिन पहाड़ी पर ख़ुले आसमान के नीचे ग़ुज़ारे.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)