पंजाब-हरियाणा में बाबाओं का बढ़ता दख़ल

संत रामपाल

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    • Author, दलजीत अमी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

हरियाणा के हिसार ज़िले में बरवाला के सतलोक आश्रम के बाहर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल तैनात हैं और दूसरी तरफ़ संत रामपाल की राष्ट्रीय समाज सेवा समिति के कार्यकर्ता हैं. अभी तक पुलिस प्रशासन अदालत के निर्देशों का पालन करने में असमर्थ रहा है.

यह घटना पंजाब-हरियाणा में एक बड़े रुझान की ओर इशारा करती है. ये रुझान है धर्म गुरुओं का अपनी सत्ता चलाने की कोशिश करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की अवमानना करना. इतना ही नहीं ये लोग अपनी निजी सेनाओं तक का गठन कर चुके हैं.

सतलोक आश्रम के पास राष्ट्रीय समाज सेवा समिति के नाम से निजी सेना है, उसी तरह सिरसा के डेरा सच्चा सौदा के पास 'शाह सतनाम जी ग्रीन 'एस' वेलफ़ेयर फ़ोर्स विंग' है. जब भी डेरा मुखिया बाबा राम रहीम की अदालत में पेशी होती है तो ये सेना सारे सिरसा शहर को सफ़ाई, सुरक्षा और श्रद्धा के नाम पर क़ब्ज़े में कर लेती है.

अगर पेशी अम्बाला या चंडीगढ़ में होती है तो श्रद्धालू इतनी बड़ी तादाद में पहुंचते हैं कि अदालत में आना-जाना मुश्किल हो जाता है. आवाजाही के तमाम बंदोबस्त गड़बड़ा जाते हैं.

टकराव

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पंजाब में जालंधर ज़िले के नूरमहल क़स्बे में दिव्या ज्योति जागृति संस्थान की अपनी निजी सेना है. इस संस्थान का कई बार सिख संस्थाओं के साथ टकराव भी हो चुका है.

अभी पिछले महीने इनका तरनतारन ज़िले में दमदमी टकसाल के समर्थकों के साथ टकराव हुआ था. दमदमी टकसाल सिख संस्था है जिनके पास हथियारबंद लोगों की अपनी सेना है.

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के मुखिया आशुतोष की मृत्य 29 जनवरी को हो गई थी पर संस्थान के प्रबंधक दावा करते हैं कि वे समाधि में हैं. इस दौरान दावेदारी और विरासत से जुड़े मामले अदालत तक पहुंच गए हैं.

संस्थान की निजी सेना अंदरुनी लड़ाई में भी ख़तरे का सबब बन सकती है.

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नामधारी परंपरा का डेरा लुधियाना के गांव भैणी साहिब में है जिसकी अपनी निजी सेना है. इस सम्प्रदाय के मुखिया सतगुरु जगजीत सिंह की मृत्यु के बाद विरासत को लेकर तकरार है और किसी बड़े टकराव का कारण कभी भी बन सकता है.

नागरिकों की सुनवाई नहीं

इस तरह तक़रीबन हर डेरा और आश्रम के पास अपनी निजी सेना है. यह सेनाएं अपने-अपने सत्संगों और प्रवचनों के मौक़ों पर सड़कों का बंदोबस्त अपने हाथ में ले लेती हैं. राधा स्वामी डेरा के कार्यकर्ता हर रविवार को सड़कों पर तैनात रहते हैं.

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इससे आम लोगों के लिए तमाम तरह की मुश्किलें बढ़ जाती हैं. दरअसल डेरे और आश्रम एक तरफ़ तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की परवाह नहीं करते और दूसरी तरफ़ नागरिकों की ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी करते हैं, यहां नागरिकों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है.

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