यूपी में कब तक मरते रहेंगे बच्चे?

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- Author, अतुल चंद्रा
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के बाल चिकित्सा विभाग में भर्ती पांच महीने के आफ़ताब निमोनिया से पीड़ित हैं.
आफ़ताब के मां-बाप बहराइच के रहने वाले हैं और उन्होंने सबसे पहले अपने बच्चे को पड़ोस के डॉक्टर को दिखाया था.
इस डॉक्टर ने एक पीने की दवा लिखी लेकिन आफ़ताब को उससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ.
इस इलाज के 12 घंटे बाद वे बहराइच के ज़िला अस्पताल पहुंचे, जहां से उन्हें फ़ौरन केजीएमयू जाने को कहा गया.
अतुल चंद्रा की रिपोर्ट
आफ़ताब खुशकिस्मत हैं कि उनके मां-बाप बिना ज़्यादा समय बर्बाद किए उन्हें लखनऊ ले आए, वरना उनकी जान को ख़तरा हो सकता था.
आंकड़े गवाह हैं कि उत्तर प्रदेश में एक माह से पांच वर्ष की आयु तक के बच्चे सबसे ज़्यादा निमोनिया से मरते हैं.
शोध

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केजीएमयू के बाल चिकित्सा विभाग की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में हर घंटे इस आयु वर्ग के 12 बच्चे निमोनिया के शिकार होते हैं.
यानी 24 घंटे में 288 बच्चे इस बीमारी से मरते हैं.
इस शोध का उद्देश्य था निमोनिया को लेकर ऐसे संदेश तैयार करना जिससे प्रभावित बच्चों का समय पर सही उपचार हो सके.
केजीएमयू के बाल रोग विभाग की प्रोफ़ेसर शैली अवस्थी कहती हैं, "बच्चों के माँ-बाप इस बीमारी के शुरुआती लक्षण नहीं पहचान पाते हैं और अपने ढंग से इलाज करवाते हैं. समय पर सही इलाज ना मिलने की वजह से हालत बिगड़ जाती है."
इलाज में देरी

इस अध्ययन में पाया गया कि निमोनिया के प्रारंभिक लक्षणों में माताएं बच्चों को गांव के ही डॉक्टर या झोलाछाप डॉक्टर के पास ले जाती हैं.
गांव से बाहर ले जाने के लिए सास या पति की अनुमति और उनका साथ ज़रूरी होता है.
किसी बड़े अस्पताल में पहुंचने से पहले बच्चे को बीमार हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय निकल जाता है और उसका एंटीबायोटिक, स्टेरॉयड से इलाज हो चुका होता है. यानी केस पूरी तरह से बिगड़ चुका होता है.
उत्तर प्रदेश और बिहार के 14 ज़िलों में किए गए इस शोध में पता चला कि निमोनिया को लोग पांच अलग-अलग नामों से जानते हैं. हालांकि निमोनिया शब्द से भी लोग परिचित पाए गए.
मौत का शिकार

डॉक्टर अवस्थी ने बताया कि देश में हर साल 18.4 लाख बच्चे पांच वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते मृत्यु का शिकार हो जाते है.
इस संख्या के 27 प्रतिशत, यानी एक चौथाई से अधिक बच्चे उत्तर प्रदेश में मरते हैं. इन 27 प्रतिशत मरने वाले बच्चों में 17 प्रतिशत निमोनिया के शिकार होते हैं.
प्रदेश में हर साल 52,094 बच्चे निमोनिया से मरते हैं.
यह आंकड़े वार्षिक स्वास्थ्य सर्वे और प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिका लांसेट से लिए गए हैं.
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