भारत को बदलेंगे या ख़ुद बदल जाएंगे मोदी?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
वह प्रभावशाली वक्ता हैं और ख़ासी भीड़ खींचते हैं. वह अपने बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे कि कोई और हों.
वह पिछले कुछ सालों में भारत के सबसे ऊर्जावान नेता हैं, वह देर रात तक काम करते हैं और अपनी पार्टी के लिए उसी जोश से प्रचार करते हैं.
वह एक दक्ष अदाकार भी हैं. हाल ही में वह एक पुलिस स्टेशन पर रुके और स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने के लिए झाड़ू उठा लिया.
लेकिन अंदर की जानकारियां रखने वाले कहते हैं कि दरअसल मोदी बहुत अकेले हैं, जो अपने आप पर तो भरोसा करते हैं लेकिन लोगों पर बहुत कम.
'अधिकार बांटें'

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इसमें कोई शक नहीं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद मोदी भारत के सबसे ताक़तवर नेता हैं.
पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने नेतृत्व में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाई. ऐसे देश में जहां, पिछले कुछ वर्षों में, कमज़ोर नेता कमज़ोर गठबंधन चलाते रहे हैं, मोदी इन सबसे पूरी तरह अलग हैं.
इंदिरा गांधी की तरह वह भी धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व पर केंद्रित अपनी एक ख़ास छवि बना रहे हैं. इंदिरा गांधी की ही तरह, मोदी भी वोट दिलाने वाले पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं.
आश्चर्य की बात नहीं कि वह सख़्ती से शासन करते हैं. पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं को पूरी तरह से हाशिए पर ला दिया गया है. जिन थोड़े से लोगों पर वह विश्वास करते हैं उनमें से एक हैं अमित शाह.
शाह का पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण है. अमित शाह ही पार्टी चलाते हैं जो एक कुशल संगठनकर्ता हैं लेकिन उनका इतिहास विवादास्पद है.
सरकार तक मीडिया की पहुंच पर मोदी का बहुत सख़्त अंकुश है. हालांकि हाल ही में मोदी ने वादा किया है कि वह इसे बदलेंगे और पत्रकारों से मिलेंगे.

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हालांकि उनके मंत्रिमंडल में बहुत प्रतिभाशाली लोग नहीं हैं, लेकिन वह मंत्रियों के अपने दल और कुछ विश्वसनीय अधिकारियों पर सख्त पकड़ के ज़रिए काम करते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, "उनका काम करने का तरीका काफ़ी प्रेज़ीडेंशियल (अमरीकी राष्ट्रपति की तर्ज़ पर) है. उन्हें अधिकारों का बंटवारा करना चाहिए और फिर उनसे काम लेना चाहिए."
'बस बड़े वायदे'
भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के वायदे के साथ मई में मोदी सत्ता में आए थे.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल (2004-2009) में जो भी अच्छा काम हुआ था, यूपीए के दूसरे कार्यकाल (2009-2014) में, एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले, अर्थव्यवस्था में मंदी और अयोग्य सरकार के चलते, वह सब धुल गया.

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मोदी को विरासत में भारी मुद्रास्फ़ीति के साथ मंद अर्थव्यवस्था और घटता रोज़गार मिला था. उनके समर्थक उम्मीद करते हैं कि वह अर्थव्यवस्था को सुधारेंगे, मुद्रास्फ़ीति पर क़ाबू करेंगे, रोज़गार के अवसर पैदा करेंगे और व्यापार की सुविधा के लिए लाल-फ़ीताशाही को ख़त्म करेंगे.
हालांकि अभी शुरुआती दिन हैं लेकिन मोदी ने अपनी सरकार में ऊर्जा भर दी है, सुर्ख़ियां बटोरने वाली कुछ योजनाएं लागू की हैं जिनमें से कुछ तो पिछली सरकारों द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों को चतुराईपूर्ण ढंग से नए सिरे से पेश किया गया है.
स्वच्छ भारत अभियान प्रशंसनीय है हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह मैला ढोने की शर्मनाक परंपरा को अनदेखा करना है.

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दूसरा अभियान है हर घर में एक बैंक अकाउंट खोलना क्योंकि अब भी देश में सिर्फ़ 40% लोगों के ही बैंक अकाउंट हैं. इसकी सफलता संभवतः कल्याणकारी कैश ट्रांस्फ़र से भी जुड़ी होगी, जिसका इरादा मोदी ने जताया है.
मोदी यह भी चाहते हैं कि भारत को एक निर्माण केंद्र में बदल दिया जाए ताकि लाखों के लिए रोज़गार पैदा हो जिसकी भारत को सख़्त ज़रूरत है. इसलिए उन्होंने 'मेक इन इंडिया' योजना शुरू की है.
आलोचकों का कहना है कि उनके सभी अभियानों में बड़े-बड़े वायदे तो हैं लेकिन उनको पूरा कैसे किया जाएगा इस बारे में कोई जानकारी नही है.
मोदी को पता है कि भारत में सरकारी वादों पर न के बराबर विश्वास करने वाले लोगों को नए सिरे से यक़ीन दिलाना होगा कि उनकी सरकार लोगों के साथ मिलकर काम करके बदलाव ला सकती है.
'जोशीली विदेश नीति'

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मोदी ने कुछ श्रम सुधार भी लागू किए हैं, डीज़ल की क़ीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है और निजी कंपनियों को कोयले के खनन के आदेश का समर्थन किया है, जो भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का 60% पूरा करता है.
आने वाले दिनों में और सुधारों की बात की जा रही है. उनकी योजना पुरातन क़ानूनों से छुटकारा पाने की भी है.
हालांकि अभी तक इस बारे में कुछ नहीं कहा जा रहा कि देश समलैंगिकता को अपराध बनाने वाले पुरातनपंथी क़ानून और औपनिवेशिक काल के राजद्रोह क़ानून से छुटकारा क्यों नहीं पा सकता जिसे अक्सर सरकारें विरोधियों को परेशान करने के लिए इस्तेमाल करती हैं.
मोदी की विदेश नीति में भी बदलाव दिख रहा है. पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में नया उत्साह देखा जा रहा है. भूटान और नेपाल की पहली यात्राओं के बाद उनकी पहली प्रमुख विदेश यात्रा जापान की थी जहां उन्होंने 33 अरब डॉलर (क़रीब 20.27 खरब रुपये) के निवेश का वादा हासिल कर लिया.

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मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को बुलाकर पाकिस्तान की तरफ़ एक बेबाक क़दम भी उठाया.
लेकिन बाद में उन्होंने पाकिस्तान के साथ तय वार्ता को रद्द कर दिया और फिर सीमा पर हिंसा की घटनाओं में हालिया वृद्धि, जिसमें 19 लोग मारे गए थे, के बाद भारत ने ज़ोरदार जवाब देने का ऐलान किया.
लंदन के किंग्स कॉलेज के हर्षवी पंत के अनुसार मोदी ने अपने परमाणु शक्ति-संपन्न पड़ोसी के साथ संबंधों की शर्तों को पुनर्भाषित करने का दांव खेलने का फ़ैसला किया है.
वह कहते हैं, "बहुत लंबे समय से इसका इंतज़ार था लेकिन अभी तक यह साफ़ नहीं है कि अगर यह दांव नहीं चलता तो फिर भारत के पास विकल्प क्या होंगे".
हालांकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा उम्मीदों के विपरीत थोड़ी निराशाजनक ही रही.

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लेकिन पंत के अनुसार मोदी सरकार, "कोशिश कर रही है कि जापान, वियतनाम और अमरीका के साथ गहरे संबंध बनाकर वह चीन के कूटनीतिक पैंतरों का बराबरी से जवाब दे".
पंत के अनुसार अपनी अमरीका यात्रा के दौरान मोदी ने वहां बसे भारतीयों से संवाद करने की कोशिश की और भारत-अमरीका रक्षा संबंधों को वापस पटरी पर लाने का प्रयास किया.
पंत कहते हैं, "ऐसा लगता है कि वह उन शर्तों को पुनर्भाषित कर रहे हैं जिन पर भारत आने वाले सालों में दुनिया से संवाद करेगा. व्यवहारिकता के साथ भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए और अधिक विश्वास के साथ आगे बढ़ना इसकी ख़ासियत हो सकती है."
'भय घटाने की ज़रूरत'
लेकिन भारत के अंदर मोदी को कुछ डरों को कम करने की ज़रूरत है.

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पहला तो हिंदू दक्षिणपंथियों के फिर से आक्रामक होने को लेकर है, जिसका इशारा बीजेपी के वैचारिक गुरू आरएसएस और कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठन करते रहे हैं.
उन संगठनों का मानना है कि हिंदुत्व को सर्वोच्च राजनीतिक विचारधारा के रूप में स्थापित कर देना चाहिए.
कई लोगों को डर है कि कमज़ोर विपक्ष के कारण मोदी दुनिया के सबसे बड़े और विविधतापूर्ण लोकतंत्र को हिंदू राष्ट्रवादी देश में बदल देंगे.
किसी भी तरह की आलोचना पर मोदी के समर्थकों में सहनशक्ति की कमी को लेकर भी घबराहट है, ख़ासतौर पर सोशल मीडिया में.
इसके अलावा डर यह भी है कि जब वह सुधारों को आगे बढ़ाएंगे तो पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दरकिनार कर दिया जाएगा और सुर्ख़ियां बटोरने वाली कुछ कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की जाएगी.

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तो मोदी भारत को बदलेंगे या भारत मोदी को बदल देगा? कई लोगों का मानना है कि दूसरी संभावना ज़्यादा है.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "आप ध्रुवीकरण करने वाले नेता होकर भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुलतावादी देश पर राज नहीं कर सकते. आपको सबको अपने साथ लेकर चलना होगा".
क्या मोदी सुधारवादी साबित होंगे? विकास के वापस रफ़्तार पकड़ने की उम्मीदों और मुद्रास्फ़ीति के कम होने से मोदी के प्रशंसक तो उनके साथ रहेंगे.
लेकिन मिलन वैष्णव कहते हैं कि मूल नीतिगत सुधार या शक्ति के केंद्रीकरण पर आधारित शासन में सुधार किए बग़ैर विकास की गति और मोदी की लोकप्रियता आने वाले दिनों में कब तक क़ायम रहेगी इस बारे में अभी लोगों की राय बंटी हुई है.
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