काला धन और अरुण जेटली की मुश्किलें

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस साल आम चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने यूपीए सरकार के लिए जो गड्ढा खोदा था वो ख़ुद उसमें गिरती नज़र आ रही है.
काला धन 100 दिन में देश के अंदर वापस लाने का वादा पूरा करना तो दूर वित्त मंत्री अरुण जेटली की इस बात के लिए चौतरफ़ा निंदा हो रही है कि वो विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों के नाम चुनिंदा तरीक़े से क्यों उजागर कर रहे हैं.
अरुण जेटली का ये तर्क क़ानूनी तौर पर सही है कि अगर वो सभी नाम बाहर लाएंगे तो ये कई देशों के साथ हुए समझौते के ख़िलाफ़ होगा.
लेकिन विडंबना यह है कि यही तर्क यूपीए सरकार ने भी दिया था. उस समय भाजपा ने इसे एक बहाना कहकर ठुकरा दिया था.
पढ़िए बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद का विश्लेषण
काले धन के मुद्दे पर अब जेटली भी कई देशों के साथ समझौता टूटने के तर्क़ का सहारा ले रहे हैं जिसके कारण उन्हें कांग्रेस की आलोचना झेलनी पड़ रही है.
उन्हें ख़ुद संघ परिवार के उन धड़ों की तरफ़ से फटकार मिल रही है जो समझते हैं कि भाजपा देश में काला धन वापस लाने के लिए बाध्य है.
हक़ीक़त तो ये है कि अरुण जेटली के इस क़दम से पांच महीने पुरानी भाजपा सरकार को पहली बार इतने कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

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चारों तरफ़ से आलोचक सरकार पर बरस पड़े हैं.
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के कहने पर सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष जांच दल का गठन किया था, जिसका काम उन लोगों के ख़िलाफ़ जांच करना है जिनके नाम काले धन की लिस्ट में कथित तौर पर हैं.
इस जांच दल को ये भी देखना है कि काला धन देश में वापस कैसे लाया जा सकता है.
'खोदा पहाड़, निकली चुहिया'
लेकिन कल अरुण जेटली की तरफ़ से तीन नाम बाहर आने पर जेठमलानी ने कहा कि जेटली का ये क़दम 'खोदा पहाड़, निकली चुहिया' की तरह है.

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ख़ुद संघ परिवार में कुछ लोगों को इस पर मायूसी हुई है.
अंदर ही अंदर बीजेपी के एक हलके में ये स्वीकार किया जा रहा है कि वित्त मंत्री की मेहनत के बावजूद न तो सभी नाम बाहर आए हैं और न काला धन देश में वापस आया है.
भाजपा ने चुनावी मुहिम के दौरान एक विशेष समिति बनाई थी जिसने विदेशों में रखे भारतीयों के काले धन का एक अंदाज़ा लगाया था जो एक खरब डॉलर के करीब था.
भाजपा का चुनावी वादा
पार्टी ने देश के मतदाताओं से वादा किया था कि ये मोटी रक़म सत्ता में आने के बाद 100 दिनों के अंदर भारत वापस लाएगी.

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लेकिन पांच महीने के बाद एक पैसा भी वापस देश में नहीं आया है.
वित्त मंत्री के पास काले धन से जुड़ी तीन संस्थाओं की रिपोर्ट हैं.
सूत्रों के अनुसार इन रिपोर्ट्स में इस बात को उजागर किया गया है कि इस काले धन की राशि जीडीपी के 45 से 70 प्रतिशत के बराबर है.
यानी हर साल एक ख़रब डॉलर के करीब काला धन देश में बन रहा है.
जेटली की मुश्किल
काला धन वो राशि है जिसका हिसाब नहीं दिया जाता और जिस पर टैक्स अदा नहीं किया जाता.

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इन रिपोर्टों में 2008 से पहले तक की स्थिति का जायज़ा लिया गया है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि अरुण जेटली की मजबूरी ये है कि वो एक साथ सारे नाम बाहर नहीं कर सकते. ऐसा करने से कई देशों के साथ किए गए समझौतों का उल्लंघन करना होगा.
सारे नाम एक साथ बाहर करने के लिए भारत को कई देशों के साथ नए समझौते करने पड़ेंगे. साथ ही अरुण जेटली को ये भी मालूम होगा कि काला धन अब भी तेज़ी से बन रहा है, जिसकी रोकथाम के लिए नए क़ानून बनाने की ज़रूरत पड़ेगी.
देश में काला धन वापस लाने के भाजपा के वादे के बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि यह वादा अभी अरुण जेटली की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हो सकता.
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