वक़्त के साथ कितना बदल रहा है संघ?

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय है जहां से संगठन का पूरा काम चलता है. संघ के प्रमुख और उनके साथ काम करने वाली टीम के अधिकांश लोग यहीं रहते हैं.
89 साल पुराने संगठन को हालांकि बहुत सारे लोग इसकी शाखाओं के माध्यम से जानते हैं जो लगभग भारत के अधिकतर शहरों में किसी न किसी रूप में होती है.
इसके अपने नियम और क़ायदे हैं और इसमें शामिल होने वालों की अपनी सोच.
हालांकि आरएसएस सबको बिना धर्म संप्रदाय के भेद के साथ लेकर चलने की बात कहता है लेकिन उसके कुछ चिंतकों के विचार विवादों के घेरे में रहे हैं.
क्या सोचते हैं संघ के केंद्र बिंदु में रहने वाले लोग, बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली ने संगठन से जुड़े कुछ लोगों से बातचीत कर यही जानने की कोशिश की.
शाखा से परिचय

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रामदास पेठ के लेंड्रा पार्क से मोहम्मद रफ़ी के गीत 'रौशन तुम्हीं से दुनियां रौनक़ हो तुम जहां की...' के फ़िज़ा में तैरते बोल, एक किनारे पर बने चबूतरे पर योग करते चार-पांच लोग और पेड़ की झुरमुट से पार्क के दूसरे कोने में दिखने वाला एक व्यक्ति, हाथ में नारियल की खरवाली झाड़ू से ज़मीन बुहारता हुआ.
सिर पर काली टोपी, ख़ाकी निकर लेकिन सफ़ेद क़मीज़ की जगह दो धारियों वाली टीशर्ट पहने, अजीत परोलकर शाखा लगाने की तैयारी कर रहे हैं.
शाखा ज़्यादातर लोगों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस से प्रथम परिचय का माध्यम होता है.
तस्वीर लेने पर मेरी तरफ़ संदेह भरी नज़रों से देखते हुए पूछते हैं, ऐसी तस्वीरें तो लाखों बार छप चुकी हैं. आज क्या विशेष है?
हिंदू क्या है

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परोलकर शायद न कहने का मूड बना रहे थे कि तभी आंखों पर मोटा चश्मा लगाए एक बुजुर्ग वहां आ गए और पूछ बैठे आरएसएस को समझना चाहते हैं तो हिंदू शब्द को लेकर आडिया क्लियर है आपका?
संघ से जुड़े किसी व्यक्ति से अगर आप संघ को लेकर सवाल करते हैं वो आपसे ये प्रश्न ज़रूर पूछता है.
75 साल के दत्तात्रेय हरिभाउ पटवर्धन विस्तार से मुग़लों के भारत पर आक्रमण, जबरन धर्मांतरण, सब भारतीय मुसलमान हिंदू ही हैं, भारत को मातृभूमि मानें, वग़ैरह से घूमती हुई बात पहुंच जाती हैं 'हिंदू धर्म नहीं, एक संस्कृति है' तक.
हिंदू वंश में समाहित

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आरएसएस दावा करता है कि हिंदू शब्द एक सांस्कृतिक भाव है और धर्म से इसका कुछ लेना देना नहीं.
मंझोले क़द के व्यवसायी परोलकर के मुताबिक़ ईसाई, मुसलमान बाहर से आए हैं इसलिए हिंदुस्तान में हिंदू धर्म की पद्धति को ज़्यादा तवज्जो देने की ज़रूरत है, जो यहां की है. सब 'उसी तरह से जीवन यापन करें तो ही ... भाईचारा हो सकता है.'
'वी और आवर नेशनहुड डिफ़ाइंड' नाम की पुस्तक में संघ के द्वितीय प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर विदेशी वंश को हिंदू वंश में समाहित हो जाने की सलाह देते हैं नहीं तो उन्हें भारत में बिना किसी अधिकार के अधीनस्थ के तौर पर रहना होगा.
गोलवलकर नहीं सावरकर

हालांकि संघ के लोग कहते हैं कि ये किताब सावरकर की थी और गोलवलकर ने महज़ इसकी प्रस्तावना लिखी थी.
परोलकर, पटवर्धन और हमारी बातों के दरमियां वहां एक और स्वयंसेवक पहुंच चुके होते हैं- प्रकाश बड़िये, जो कभी संघ के प्रचारक रहे थे.
उनके अनुसार हिंदू संस्कृति नर्म है, हिंदू राजाओं ने दूसरे देश पर कभी आक्रमण नहीं किया.
आरएसएस की स्थापना दिवस के भाषण में 'इस वर्ष की विशिष्टता' का बखान करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने चोल राजा राजेंद्र के शासन के हज़ार साल पूरे होने का ज़िक्र किया.
दक्षिण पूर्व एशिया के कई क्षेत्रों तक फैले शासन और श्रीलंका को अपने राज में मिलाने वाले राजेंद्र चोल ने साम्राज्य के विस्तार के लिए सेना का प्रयोग किया था.
लेंड्रा पार्क में हुई शाखा में मात्र नौ लोग पहुंचते हैं. संघ के विजयादशमी के कार्यक्रम में भी चार से पांच हज़ार स्वंयसेवक ही थे.
सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़ाव

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संगठन के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य हालांकि शाखा में घटती संख्या और शामिल होने वालों की बढ़ती उम्र की बात से इंकार करते हुए कहते हैं कि जीवन में जटिलता बढ़ी है.
वो कहते हैं कि साप्ताहिक शाखाएं शुरू की गई हैं और सोशल मीडिया की वजह से संघ के विचार लोगों तक सीधे पहुंच रहे हैं.
नए तरीक़े में कोई व्यक्ति संघ की वेबसाइट पर रजिस्टर कर सकता है जिसके बाद उससे संपर्क स्थापित करने का काम संघ का होता है.
भागवत ने शाखा को देश के कोने-कोने में पहुंचाने की बात कही है.
अपने वार्षिक भाषण में भागवत ने देश के विकास के लिए जिन चिंतकों से प्रेरणा लेने की बात कही उसमें विवेकानंद और रवीन्द्र नाथ ठाकुर से लेकर विनोबा भावे, राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण जैसे लोगों के नाम शामिल थे.
नाम भीमराव अंबेडकर का भी था जिनके गुणों की चर्चा पिछले कुछ सालों से संघ बार-बार करता रहा है.
मार्गदर्शन

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संघ प्रमुख के भाषण को आगे के साल के लिए मार्गदर्शन भी कहा जाता है.
पिछले साल के भाषण में संघ प्रमुख ने मत प्रतिशत बढ़ाने की बात कही थी और संघ कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर लोगों को प्रेरित किया.
नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी में सीधे भागवत के दख़ल की बात से मनमोहन वैद्य सीधे तौर पर इंकार करते हैं.
लेकिन संघ के विचारक प्रोफ़ेसर आरएच तुपकरी कहते हैं कि अगर कांग्रेस फिर जीत जाती तो आरएसएस पर प्रतिबंध का ख़तरा था, ऐसे में 'हम संघ को कुचलने की नीयत रखनेवाली सरकार को किस तरह आने देते?'
लेकिन मनमोहन वैद्य ज़ोर देकर कहते हैं कि किसी की हिम्मत नहीं कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की सोचे.
सभी उत्साहित

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केंद्र में मोदी की अपने बल बूते बनी सरकार के होने का आत्मविश्वास संघ में दूसरे तरीक़ों से भी दिखता है और नरेंद्र मोदी के नाम का ज़िक्र होते ही लगभग सभी उत्साहित दिखते हैं.
संघ की सबको साथ लेकर चलने और किसी धर्म, संप्रदाय के ख़िलाफ़ न होने की बात का उदाहरण देते हुए तुपकरी कहते हैं कि संघ ने मुस्लिम मंच खड़ा किया है जिसके पांच लाख सहभागी हैं.
आरएसएस पर शोधकर्ता दिलीप देवधर कहते हैं कि संघ फ़ीडबैक बेस्ड आर्गनाइज़ेशन है और उसमें बराबर परिवर्तन होते रहते हैं.
तुपकरी लेकिन उस आरोप को सही मानते हैं कि मुसलमान लड़के योजनाबद्ध तरीक़े से हिंदू लड़कियों को बहला फुसलाकर शादी कर रहे है जिसका अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण होता है.
लव जिहाद

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आरएसएस के कई सालों तक प्रवक्ता रहे और कई दूसरे अहम पदों पर रहे एमजी वैद्य भी कहते हैं कि लव जिहाद से पूरी तरह से इंकार नहीं किया जा सकता है.
एमजी वैद्य लंबे समय तक एक क्रिशचियन कॉलेज में संस्कृत के लेक्चरर थे और स्वीकार करते हैं कि उनके आरएसएस से जुड़े होने के बावजूद कॉलेज ने कभी उन पर दबाव नहीं बनाया.
इन सबके बीच बीजेपी नेता आदित्यनाथ के बयान कि 'अगर वो एक हिंदू लड़की को ले जाते हैं तो हम 100 मुसलमान लड़कियों को ले जाएंगे के बयान' की किसी तरह की निंदा की बार बार पूछने पर कोई गुंजाइश नहीं दिखती.
अपने घंटे भर से अधिक लंबे भाषण में आरएसएस प्रमुख ने किसी बात का उदाहरण देते हुए कहा था कि चीज़ें जितनी भी बदल जाए बदलता कुछ भी नहीं है!
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