नवरात्र में महिलाओं को 'नो एंट्री'

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत के कई हिस्सों में नवरात्रि की धूम है. इस दौरान हिंदू देवी दुर्गा की विधिवत पूजा होती है जिन्हें नारी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है. लेकिन बिहार के विश्व प्रसिद्ध नालंदा ज़िले के एक मंदिर में नवरात्रि के दौरान महिलाओं का ही प्रवेश वर्जित रहता है.
यह मंदिर कहां है, वहां क्यों है महिलाओं पर प्रतिबंध?
पढ़िए पूरी रिपोर्ट
जैनियों के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पावापुरी से लगभग तीन किलोमीटर दूर घोसरावां में मां आशापूरी मंदिर है.
मां आशापूरी के रूप में देवी दुर्गा की पूजा यहां होती है. लेकिन दुर्गा पूजा के सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर यानी कि नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है.

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मंजू देवी मंदिर के बाहर पूजा-साम्रगी बेचती हैं. वह कहती हैं कि मंदिर में जाने का मन तो करता है, लेकिन माता मन को समझा देती हैं.
परंपरा
सत्येंद्र प्रसाद शर्मा मां आशापुरी मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष हैं.
वह बताते हैं, "अपने बाप-दादा से हम सुनते आए हैं कि मंदिर निर्माण के समय से ही यह परंपरा चली आ रही है. ये सदियों पुराना मंदिर है."

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मंदिर में प्रवेश वर्जित क्यों रहता है, इस संबंध में वे बताते हैं कि नवरात्रि के दौरान मंदिर में तांत्रिक पद्धति से पूजा होती है और इस पूजा पद्धति में महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है.
लेकिन धीरे-धीरे अब इस पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. घोसरावां के ही विनोद सिंह कहते हैं, "जब वैष्णो देवी, कामख्या मंदिर जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में महिलाओं पर प्रतिबंध नहीं है तो यहां क्यों?"
अनहोनी का डर
ऐसे में क्या इस परंपरा को तोड़ने की कोई पहल नहीं हो रही? इस संबंध में विनोद बताते हैं कि ग्रामीणों में एक डर बैठा है कि जो भी इसके लिये पहल करेगा, उस पर या उसके कारण पूरे गांव पर विपत्ति टूट पड़ेगी.

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लेकिन गांव में कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने पहल की हो और फिर कोई अनहोनी हुई हो.
दूसरी ओर, यह परंपरा टूटे, इसमें वैचारिक जड़ता भी एक बाधा दिखाई देती है. राजीव रंजन कुमार जैसे युवा सत्य सनातन संस्कृति का हवाला देते हुए इस परंपरा का समर्थन करते हैं.
रास्ता
महिलाओं पर प्रतिबंध क़ानूनी रुप से भी ग़लत है. यह सत्येंद्र प्रसाद शर्मा जैसे कई दूसरे लोग भी मानते हैं, लेकिन वे परंपरा के आगे ख़ुद को असहाय बताते हैं.

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सत्येंद्र के अनुसार अगर इस दिशा में प्रशासन या न्यायालय कोई आदेश करे तभी यह परंपरा समाप्त हो सकती है. साथ ही महिलाओं को भी पहल करनी होगी.
हालाँकि समय बदल चुका है लेकिन पूनम जैसी महिलाएँ परंपरा का हवाला देते कहती हैं, "जो पुराने समय से चला आ रहा है, वही ना होगा."
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