महाराष्ट्र चुनावः किसमें कितना है दम

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- Author, प्रकाश दुबे
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
महाराष्ट्र की राजनीति ऐसे दोराहे पर आकर खड़ी हो गई है जहां नतीजे आने से पहले तक पक्के तौर पर तो क्या ठीक से कयास लगाना भी मुश्किल लग रहा है.
एक तरफ आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा है तो दूसरी तरफ लंबे अर्से से सत्ता से निर्वासित शिवसेऩा है.
सियासी समर में और भी खिलाड़ी है. महाराष्ट्र कांग्रेस की राजनीति के आखिरी बचे हुए किलों में से है जिसे वह हर कीमत पर बचाए रखना चाहेगी.
लेकिन शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए भी इन चुनावों में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है.
कहते हैं कि गठबंधन टूटते हैं तो नए समीकरणों की संभावना बनती है.
महाराष्ट्र विधानसभा शायद इसी लिहाज़ से महत्वपूर्ण हैं कि नतीजे आने के बाद सरकार बनाने के लिए किसको किसकी और कितनी जरूरत पड़ेगी.
प्रकाश दुबे का विश्लेषण

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महाराष्ट्र में सत्ता पक्ष और विपक्षी गठजोड़ का तालमेल टूटने के बाद सभी पार्टियों के लिए उम्मीदवार तलाश करना मुश्किल हो रहा है.
उम्मीदवार पाने के लिए दल बदल का नुस्खा भी अपनाया जा रहा है. सबसे अधिक बिखराव शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हुआ है.
मंत्री, विधायक, पूर्व विधायक मिलाकर एक दर्जन नेता भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों में शामिल हुए हैं.
बुराई में अच्छाई तलाश करना चाहें तो इससे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का एक लाभ जरूर हुआ.
जिला स्तर नेता तक अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलाने में में सफल रहे हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो दर्जन से अधिक ऐसे उम्मीदवार होंगे जिनका कोई न कोई सगा पहले से विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा या विधानपरिषद में मौजूद है.
मुंडे की विरासत

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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के असंतुष्ट भाजपा की शान बढ़ा रहे हैं. भाजपा-शिवसेना नेता जिनके भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के विरोध में जांच की मांग करते हुए सदन की कार्रवाई रोकते थे, अब उनके लिए ही भाजपा ने रे़ड कार्पेट बिछाया है.
भाजपा पर भी वंशवाद के आरोप लग रहे हैं. दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की बड़ी बेटी पंकजा परली में विधानसभा और छोटी बेटी डॉक्टर प्रीतम बीड लोकसभा उपचुनाव में पिता की विरासत बचाने की कोशिश करेंगी.
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पंकजा की काट के लिए उनके चचेरे भाई धनंजय को मैदान में उतारा है.
नामांकन के बाद दूसरा काम प्रचार का होता है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने चुनाव प्रचार से पहले 'नैतिकता' के आधार पर सरकार से समर्थन वापसी का निर्णय किया है.
चव्हाण का दांव

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मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने त्यागपत्र भिजवा कर नैतिकता की चादर अपनी तरफ खींचकर दो तीर चलाए हैं.
पहला तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भाजपा की आपसी मिलीभगत का आरोप लगाकर अल्पसंख्यक मतों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की है.
दूसरे भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का नारा ज़ोर से बुलंद किया है.
सहकारिता जांच के बाद सिंचाई घोटालों की जांच कराने का एलान कर चव्हाण ने राकांपा के विरुद्ध सभी दलों को प्रचार का मुद्दा थमा दिया.
विधायक मुफ़्ती इस्माइल को शामिल कराने शरद पवार स्वयं मालेगांव गए. कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से तालमेल का मन बना लिया.
राणे का नारा

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यहीं से शिवसेना का अभियान आरम्भ होता है. 26 सितम्बर को पार्टी मुखपत्र सामना के संपादकीय में शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोलते हुए लिखा, "इस तम्बू में वंदना करने वाले आज नमाज़ पढ़ रहे हैं."
कभी निज़ाम रियासत का हिस्सा रहे मराठवाड़ा के साथ ही मुंबई के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में मुस्लिम इत्तहादुल मुसलमीन-एमआईएम के उम्मीदवार नामांकन भर चुके हैं.
शिवसेना का दूसरा हमला अमित शाह पर है. इस बहाने मुंबई के मराठी वोट एकजुट करने का प्रयास है. कांग्रेस की तरफ से नारायण राणे भी पुरानी पार्टी शिवसेना के नारों से वोट पाना चाहते हैं.
राणे ने आरोप लगाया है कि भाजपा मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहती है. नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की गुज्जू जोड़ी की तरफ इशारा कर कोंकण के मराठी वोट लुभाना चाहते हैं.
राज का रोल

राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाकर मराठी मतदाताओं के बीच आक्रमक छवि से पैठ बनाई है लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदाता ने चतुराई बरती. मनसे को लोकसभा चुनाव में मात्र 0.13 प्रतिशत मिले.
सभी उम्मीदवार हारे. शिवसेना और मनसे को साथ लाकर ठाकरे परिवार जोड़ने की आधे मन से की गई पहल अब ठंडी पड़ चुकी है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अभी भी मनसे को खेल-बिगाड़ू मानते हैं.
गोदावरी नदी के दक्षिण में भाषा एवं क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर दोनों ठाकरे पैर जमाना चाहेंगे. उनके लिए यह आखिरी दांव साबित हो सकता है.
288 सदस्यों की विधानसभा में जादुई आंकड़ा 145 है. चार बड़े दलों में से किसी को इतने समर्थन की उम्मीद नहीं है. 80 विधायकों का आंकड़ा पार करने वाला दल सत्ता के करीब होगा.
विदर्भ की हिमायत

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अभी से अटकल लगाना जल्दबाजी है. फिर भी सत्ता की ख़ातिर भाजपा-शिवसेना एक दूसरे की पहली पसंद होंगे. यही हाल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का होगा. वैसे कांग्रेस को शिवसेना और भाजपा को राष्ट्रवादी कांग्रेस से किसी तरह का गुरेज नहीं होगा.
कहें कुछ भी. मनसे सहित छोटे दल पवित्र कन्याओं की तरह हैं जिन्हें नवरात्रि में भोजन कराने से शुभ फल मिलता है.
विदर्भ के इलाके में दलबदलुओं की भीड़ से हर्षित भारतीय जनता पार्टी के साथ ही कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विदर्भ में अलग राज्य के हिमायती बनकर बात करेंगे.
लेकिन कतई नहीं चाहेंगे कि इसकी गूंज पश्चिम महाराष्ट्र में सुनाई पड़े. अकस्मात कोई अन्य मुद्दे नहीं उभरे तो विदर्भ राज्य की मांग करने वाला बड़ा समूह नई विधानसभा में बैठेगा.
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