बोर्ड में महिला निदेशकों की कमी क्यों?

इमेज स्रोत, AFP
- Author, अनुभा रोहतगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय बाज़ार की नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी के नए नियमों के मुताबिक सूचीबद्ध कंपनियों को अपने बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक को रखना होगा.
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज एनएसई में सूचीबद्ध कंपनियों में से पचास फ़ीसदी कंपनियों में फ़िलहाल एक भी महिला निदेशक नहीं है.
कई जानकारों के अनुसार इसकी वजह भारतीय कॉरपोरेट जगत में पुरुषों का वर्चस्व और ये सोच है कि महिलाओं को कारोबार की समझ नहीं होती.
पढ़िए विस्तार से
सेबी ने हर सूचीबद्ध कंपनी में कम से कम एक महिला निदेशक रखे जाने के लिए कंपनियों को एक अप्रैल 2015 तक का समय दिया है.
भारत में इस वक्त मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में 4043 और एनएसई में 1462 कंपनियां सूचीबद्ध हैं.
एनएसई और प्राइमडेटाबेस नाम की कंपनी द्वारा संचालित इंडियनबोर्ड्स डॉट कॉम वेबसाइट भारतीय कंपनियों में निदेशकों से जुड़ी जानकारी पर लगातार नज़र रखती है.
वेबसाइट द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक एनएसई की 728 यानी 50 फ़ीसदी कंपनियों में अभी तक एक भी महिला निदेशक नहीं है.
यानी हर सूचीबद्ध कंपनी में कम से कम एक महिला निदेशक होने के सेबी के निर्देश को पूरा करने के लिए तयशुदा समय सीमा तक हर रोज़ औसतन चार महिलाओं को शामिल करना होगा.

भारत की सबसे क़ामयाब महिला उद्यमियों में से एक किरण मज़ुमदार शॉ बायोटेक्नॉलोजी कंपनी बायोकोन की चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. साथ ही वह आईटी कंपनी इंफ़ोसिस लिमिटिड के बोर्ड में एक स्वतंत्र निदेशक भी हैं.
सेबी के इस कदम के बारे में वह कहती हैं, “नए कंपनी क़ानून के तहत ये महसूस हुआ कि कंपनी बोर्ड में महिलाओं की मौजूदगी बहुत ज़रूरी है. इससे लैंगिक विविधता को बढ़ावा मिलेगा.”
ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन की महानिदेशक रेखा सेठी तीन सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में शामिल हैं. वह सेबी के कदम को एक सकारात्मक पहल मानती हैं.
लेकिन प्राइमडेटाबेस के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रणव हल्दिया कहते हैं कि सेबी का निर्देश आने के बाद से कुछ कंपनियों के बोर्ड में परिवार की किसी महिला को ही शामिल कर लिया गया है जिससे इसका मक़सद पूरा नहीं होता.
उदाहरण के तौर पर वह रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का हवाला देते हैं जहां कंपनी मालिक मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी को हाल ही में बोर्ड में शामिल किया गया.
प्रणव हल्दिया कहते हैं, “हम मानते हैं कि सेबी को स्वतंत्र महिला निदेशक रखने की बात कहनी चाहिए थी ताकि वे प्रमोटर या मालिक की ही बात न दोहराएं. इससे बोर्ड में विविधता का मक़सद ख़त्म हो जाता है.”

रेखा सेठी के मुताबिक बोर्डरूम में महिलाओं की कमी की एक वजह 'ग्लास सीलिंग' है.
वह कहती हैं, "महिलाओं को कई बार परिवार और बच्चों की वजह से करियर में आगे बढ़ने में मुश्किल होती है. अभी भारत में इतनी क्वालिफ़ाइड महिला प्रोफ़ेशनल नहीं हैं जिन्हें कंपनियों के बोर्ड में शामिल किया जाए. दूसरी वजह है पारंपरिक सोच जिसे बदलने में अभी समय लगेगा."
लेकिन किरण मज़ुमदार शॉ कहती हैं कि भारत में काबिल महिला पेशेवरों की कमी नहीं है.
उनका कहना है, “महिलाओं ने ये साबित कर दिया है कि वे भी क़ामयाब तरीके से बिज़नेस चला सकती हैं. लेकिन उन्हें अब तक बोर्डरूम से बाहर रखा गया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि ये पुरुष प्रधान बोर्ड हैं. ये अगर नए सदस्यों को शामिल करने के बारे में सोचते भी हैं तो सिर्फ़ पुरुषों को ही. तो ज़रूरत है इस मानसिकता को बदलने की."
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












