'कायरता' के आरोप में 18 जवान निलंबित

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में तैनात सुरक्षा बल के 18 जवानों को 'कायरता' के आरोप में निलंबित कर दिया गया है.
इनमें से 17 जवान केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की 80वीं बटालियन के हैं जबकि एक जवान छत्तीसगढ़ पुलिस का है जो तोंगपाल थाने में तैनात है.
यह निलंबन 11 मार्च को सुकमा ज़िले के तहकवाड़ा की घटना की जांच के बाद लिया गया है जिसमें माओवादियों के हमले में सुरक्षा बल के 15 जवान मारे गए थे. मारे गए जवानों में 11 सीआरपीएफ़ की 80वीं बटालियन के थे जबकि चार जवान ज़िला पुलिस बल के. इसके अलावा एक आम नागरिक की भी मौत हुई थी.
निलंबित किए गए जवानों पर घटना स्थल से भाग जाने का आरोप लगा था जिसके लिए विभागीय जांच बैठाई गई थी. पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि जांच में निलंबित किए गए सभी जवानों को कायरता का दोषी पाया गया है.
पहला मौक़ा
बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि निलंबित किए गए जवानों में सीआरपीएफ़ के एक निरीक्षक, दो सहायक उप निरीक्षक और 14 आरक्षी शामिल हैं जबकि तोंगपाल थाने में तैनात जवान को भी निलंबित किया गया है.

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यह पहला मौक़ा है जब किसी बड़ी नक्सली घटना के बाद बचे हुए जवानों को कायरता के आरोप में निलंबित किया गया हो.
हालांकि इस निलंबन को पुलिस महकमे में सही तरह से नहीं देखा जा रहा है क्योंकि कुछ का मनना है कि जिन इलाक़ों में संघर्ष चल रहा हो वहां इस तरह के निलंबन से जवानों के मनोबल पर नाकारात्मक असर पड़ेगा.
प्रेरणा की कमी
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक प्रकश सिंह कहते हैं, ''अक्सर देखा गया है कि संघर्ष के इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बल के जवानों की प्रेरणा में कमी होती है. क्योंकि उनके पास सुविधाएं नहीं है. उनका नेतृत्व करने वाले अच्छे अधिकारियों की भी कमी है.''

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प्रेरणा की कमी की वजह से कई बार जवान संघर्ष करने की बजाय पीछे हटना बेहतर समझते हैं.
पूर्वी और मध्य भारत के नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बल के जवानों को कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है. कुछ इलाक़ों में तो उनको बुनियादी सुविधाओं के बिना ही रहना पड़ रहा है.
बस्तर संभाग में ही कई इलाक़े ऐसे भी हैं जहाँ सुरक्षा बल के जवान अपने कैंपों में कैदियों की तरह रह रहे हैं. इन कैंपों में उनके लिए राशन पहुंचाना तक जंग लड़ने के ही बराबर है.
कुछ जानकारों को लगता है कि इस तरह निलंबित किए जाने के बाद बाक़ी जवानों का मनोबल ज़रूर टूट जाएगा.
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