'ईको-फ़्रेंडली' गणपति को सड़कों से ख़तरा

- Author, मधु पाल
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मुंबई में गणपति को घर पर मेहमान बनाकर रखने की तैयारियों में ग़ज़ब का जोश है.
गणेश उत्सव के लिए लोग ख़रीददारी में लगे हुए हैं और इस बार ज़्यादा आकर्षण है 'ईको-फ्रेंडली' यानी पर्यावरण के अनुकूल बने गणपति का.
जानना दिलचस्प है कि यह 'ईको-फ्रेंडली' गणपति क्या हैं और कैसे बनते हैं.
सड़क से ख़तरा

समीर माडगुलकर मूर्तिकार हैं और पिछले 14 साल से गणपति गढ़ रहे हैं.
समीर पीओपी यानी प्लास्टर ऑफ़ पैरिस से बनी बप्पा की मूर्ति की बजाए शाडू मिट्टी से बनी मूर्ति ख़रीदने की सलाह देते हैं.
शाडू मिट्टी से बनी मूर्ति पानी में आसानी से घुल जाती है और प्रदूषण नहीं फैलाती.
ईको-फ्रेंडली गणपति बनाने वाली शाडू मिट्टी ज़्यादातर नदी के किनारे मिलती है. इस मिट्टी का आर्डर साल की शुरुआत यानी जनवरी में ही दिया जाता है.
समीर बताते हैं कि इस मिट्टी के गणपति में नारियल के छिलके जिसे मराठी में 'कटिया' कहते हैं, इस्तेमाल करते है.
इसके अलावा पैपर-मैश यानी कागज़ की लुग्दी से बने गणपति भी ख़रीदे जा सकते हैं.
सड़कें हैं रोड़ा

'पेपर-मैशे' यानी काग़ज़ से बनी मूर्तियों की क़ीमत 1,000 रुपये से शुरू होती है वहीं शाडू मिट्टी से बनी मूर्तियां पीओपी की मूर्तियों से क़रीब 50 फ़ीसदी से ज़्यादा महंगी होती हैं.
मुंबई स्थित लोअर परेल मशहूर है गणेश फ़ैक्ट्री के नाम से. यहां की बनाई हुई मूर्तियां मुंबई के कई इलाक़ों जैसे चर्चगेट से विरार, घाटकोपर, ठाणे, मुंबई के बाहर रत्नागिरी, पुणे और देश के बाहर भी जाती हैं.
मैंने लालिकेत से पूछा यहां 'ईको-फ्रेंडली' गणपति कितने हैं. जवाब मिला कि बड़े-बड़े गणपति 'ईको-फ्रेंडली' नहीं बनाए जाते. ऐसा नहीं है कि इन्हें बनाना नामुमकिन है लेकिन मुंबई की सड़कों से उसे ठीक-ठाक पंडाल तक पहुंचाना बहुत मुश्किल है. यहां सड़कों की हालत इतनी ख़स्ता है कि इनके पंडाल टूटने का डर होता है. ये ज़्यादा नाज़ुक और भारी होते हैं. हमें ईको फ्रेंडली गणपति बनाने में ज़्यादा ख़ुशी होगी लेकिन जब बड़े -बड़े पंडाल ही हमें आर्डर नहीं देते तो हम कैसे बना सकते हैं.

मुंबई के सबसे पुराने गणपति मंडल गणेश गली की स्थापना हुई थी 1928 में और यहाँ से शुरू हुई सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की परंपरा.
जब मैंने 'ईको -फ्रेंडली' गणपति के इस्तेमाल के बारे पूछा तो यहां के सचिव स्वपनिल परब का कहना था कि हमें भी पर्यावरण की उतनी ही चिंता है जितनी आप सब को लेकिन यह मुश्किल है. वो मूर्ति ज़्यादा मज़बूत नहीं होती. कभी भी टूटने का डर रहता है सड़कों में लोगों की भीड़ रहती है और ज़रा धक्का लगा तो कुछ भी हो सकता है.
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