मनमोहन के सात अजूबे, मज़ाक भी करते हैं

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खुलकर न बोलने की वजह से उनका नाम ही मौनमोहन सिंह पड़ गया. अब उनकी इस छवि को तोड़ती है उनकी बेटी दमन सिंह की किताब ‘स्ट्रिक्टली पर्सनल: मनमोहन एंड गुरुशरण’.
इस पुस्तक से ही मनमोहन सिंह से जुड़ी 7 दिलचस्प बातें.
1. मनमोहन सिंह के पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने. लिहाजा मनमोहन सिंह ने अप्रैल, 1948 अमृतसर के खालसा कॉलेज के प्री-मेडिकल कोर्स में दाखिला लिया लेकिन कुछ ही महीनों के बाद उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी. वजह- मेडिकल की पढ़ाई दिलचस्प नहीं लगी.
2. पढ़ाई छोड़ने के बाद मनमोहन सिंह अपने पिता की दुकान पर हाथ बँटाने लगे लेकिन यहां भी उनका मन नहीं लगा. दुकान पर पिता उनसे छोटे-मोटे काम ही करने को कहते. ऐसे में मनमोहन सिंह ने तय किया कि वो फिर से कॉलेज में पढ़ने जाएँगे. इसके बाद उन्होंने सिंतबर, 1948 में हिंदू कॉलेज में दाखिला लिया.

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3. मनमोहन सिंह की विज्ञान में दिलचस्पी नहीं थी. लिहाजा इस बार उन्होंने अर्थशास्त्र को अपना विषय बनाया. मनमोहन सिंह के मुताबिक उन्हें गरीब और गरीबी दोनों विषय में दिलचस्पी थी, वे जानना चाहते थे कि कोई देश गरीब क्यों है और कोई अमीर क्यों हो जाता है? इसी जिज्ञासा ने अर्थशास्त्र में उनकी दिलचस्पी जगाई.
'सस्ता खाना खाते थे'
4. बाद में वे पढ़ाई के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए तो आर्थिक तंगी की वजह से उन्हें काफी किफायत से रहना होता था. हर साल उनके रहने और पढ़ने का ख़र्च करीब 600 पाउंड था, लेकिन उन्हें स्कॉलरशिप में 160 पाउंड मिलते थे. ऐसे में वे हमेशा सस्ता खाना खाते और कई बार भूखे ही रह जाते.
5. पढ़ने के लिए मनमोहन सिंह ने अपने एक दोस्त से दो साल तक 25 पाउंड सालाना का कर्ज भी मांगा था, लेकिन दोस्त ने महज 3 पाउंड ही भेजे.

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6. मनमोहन सिंह की पहचान भले मौनमोहन की बनी हो, लेकिन अपने दोस्तों के बीच उन्हें मज़ाक करने की आदत भी रही है. इतना ही नहीं, उन्हें लोगों को निकनेम देने में खूब मजा आता रहा है. यहाँ तक कि अपनी पत्नी गुरशरण कौर का निकनेम उन्होंने गुरुदेव रखा हुआ है.
7. मनमोहन सिंह कोई घरेलू काम नहीं कर पाते हैं. वे न तो अंडा उबाल सकते हैं और न ही टेलीविजन चालू कर सकते हैं.
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