महिला आरक्षण बिल ने संसद में तोड़ा दम

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
राज्य सभा से वर्ष 2010 में पारित हो चुके महिला आरक्षण विधेयक ने लोकसभा में दम तोड़ दिया है. अब सरकार को नए सिरे से यह विधेयक लाना पड़ेगा और दोनों ही सदनों में इसे दोबारा पारित कराना होगा.
इस बिल के तहत संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव था.
बिल की मियाद ख़त्म होने से महिला संगठन आहत हैं और नाराज़ भी.
कार्यकर्ताओं का मानना है कि 'पुरुष प्रधान' राजनीतिक दल, संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं. उनका आरोप है कि महिला आरक्षण बिल पर सभी राजनीतिक दलों की सोच एक जैसी ही है.
पढ़िए पूरी रिपोर्ट
साल 2010 में यूपीए ने जब यह बिल राज्यसभा में पेश किया था तो इस पर जमकर हंगामा हुआ था.
राज्यसभा में तो समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इसका जमकर विरोध भी किया था. राज्यसभा में हालांकि बिल पारित तो हो गया, मगर हंगामा करने वाले समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के सात सांसदों को अध्यक्ष ने निलंबित कर दिया था.

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क़ानून के जानकारों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत जो विधेयक लोकसभा में विचाराधीन रह जाते हैं, वह उसके भंग होते ही ख़त्म हो जाते हैं.
महिला आरक्षण बिल के अलावा 68 अन्य बिलों ने भी पिछली लोकसभा के भंग होते ही दम तोड़ दिया है.
इनमें नागरिकों के लिए समय पर सेवा हासिल करने के अधिकार का बिल और शिकायत निवारण के बिल भी शामिल हैं.
सोच महिला विरोधी है

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महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली शबनम हाशमी कहती हैं, "राज्यसभा से लोकसभा तक के लिए महिला आरक्षण बिल को सिर्फ पांच मिनट का ही सफर तय करना था. मगर दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो पाया."
वे कहती हैं, "कई क्षेत्रीय दलों ने इसका विरोध किया था. मगर मुझे लगता है कि इसमें राजनीतिक इच्छा शक्ति की ही ज़रूरत थी. इतने बिल पास हुए. इसे भी पास कराया जा सकता था."
शबनम हाशमी का कहना है कि पुरुष प्रधान राजनीतिक दल नहीं चाहते कि महिलाओं को तरजीह मिले.
ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेंस एसोसिएशन की कविता कृष्णन सरकार की इस दलील को बेकार बताती हैं कि महिलाओं के लिए आरक्षण के सवाल पर राजनीतिक दल एक साथ नहीं हैं.

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वे कहती हैं, "राजनीतिक दलों की मानसिकता के बदलने का इंतज़ार अगर सरकार करेगी तो यह बिल कभी पारित नहीं हो सकता. मुझे लगता है कि पिछली सरकार और मौजूदा सरकार में कोई ख़ास अंतर नहीं है. चूंकि समाज में महिला विरोधी सोच है इसलिए राजनीतिक दलों को फायदा होगा अगर वे इस तरह के बिल का विरोध करें."
महिला आरक्षण बिल को अब एक बार फिर से पूरी संवैधानिक प्रक्रिया से दोबारा गुज़ारना पड़ेगा. एनडीए को राज्यसभा में बहुमत हासिल नहीं है इसलिए एक बार फिर इसके पारित होने में पेंच फंस सकता है.
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