जस्टिस लोढ़ा ने की मोदी सरकार की आलोचना

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के मामले में भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के साथ हुए व्यवहार से वह स्तब्ध हैं.
बार काउंसिल की ओर से न्यायमूर्ति बी एस चौहान के विदाई समारोह में शामिल हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "गोपाल सुब्रमण्यम को एकतरफ़ा तरीक़े से अलग किया गया और कार्यपालिका ने बिना मुझे बताए या मेरी सहमति के ऐसा किया."
उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने जज नियुक्त करने के लिए चार नामों की सिफारिश की थी.
इनमें से गोपाल सुब्रमण्यम के नाम पर विधि मंत्रालय ने यह कहकर आपत्ति दर्ज की थी कि उन्होंने टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में अभियुक्त ए राजा के वकील से मुलाक़ात की थी. विधि मंत्रालय ने कॉलेजियम का प्रस्ताव वापस भेज दिया और कहा कि वो सुब्रमण्यम के नाम पर पुनर्विचार करें.
सुब्रमण्यम का कहना था कि उन्होंने अपना नाम वापस लेने के लिए मुख्य न्यायाधीश को चिठ्ठी लिखी थी क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह की कड़वाहट उत्पन्न हो.
गोपाल सुब्रमण्यम का इनकार

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मुख्य न्यायाधीश लोढ़ा ने कहा कि यहाँ तक कॉलिजियम को भी इस बारे में कुछ नहीं बताया गया.
न्यायमूर्ति लोढ़ा ने सरकार के फैसले को एक-तरफ़ा क़रार देते हुए बताया कि उन्होंने गोपाल सुब्रमण्यम से अपनी चिठ्ठी वापस लेने को कहा था लेकिन सुब्रमण्यम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया.
मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी पर जाने-माने अधिवक्ता के टी एस तुलसी का कहना है कि इस पूरे मामले में अगर अब तक किसी का पक्ष सामने नहीं आया था तो वो था सुप्रीम कोर्ट का.
उन्होंने कहा, "अब तक हमारे सामने सरकार का पक्ष था, गोपाल सुब्रमण्यम का पक्ष था मगर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं कहा था. मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा वह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें मालूम ही नहीं था कि सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय ली थी या नहीं."
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