पाकिस्तान: हिंदी को लेकर खड़े हुए कान

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- Author, इंदु पाण्डेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पिछली ईद के पहले कराची में जब एक मौलवी साहब ने कहा “विश्वास कीजिए चाँद दिखा है और हम कल ईद मनाएंगे."
हंगामा हो गया, लोगों की भौंहें तन गईं.
कारण ये था कि मौलवी साहब ने 'विश्वास' कहा 'यक़ीन' नहीं.
पाकिस्तान में 'मुन्ना भाई' और 'चुलबुल पांडे' इस कदर जवानों और बच्चों की भाषा को प्रभावित कर रहे हैं कि माँ-बाप सहित ख़ालिस उर्दू की वकालत करने वाले परेशान हैं.
पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में, टीवी सीरियल ख़ूब देखे जाते हैं, लेकिन ज़्यादा लोग हिंदी पढ़ नहीं पाते.
हिंदी की वर्कशॉप

हाल ही में लाहौर यूनिवर्सिटी ने हिंदी या देवनागरी लिपि पर एक वर्कशॉप का आयोजन हुआ.
इस कार्यशाला का आयोजन तैमूर शाहिद खान ने किया, जो ख़ुद एक अनुवादक हैं.
दरअसल उर्दू और हिंदी एक ज़बान हैं केवल लिपि या स्क्रिप्ट अलग-अलग हैं.
इस वर्कशॉप में भाग लेने वाले अतहर मसूद लाहौर विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं. मसूद ने बीबीसी हिन्दी को फ़ोन पर बताया, "यहां की पुरानी लाइब्रेरियों में हिंदी की किताबें तो हैं, लेकिन उनको पढ़ने वाला कोई नहीं है." मसूद कहते हैं कि हिंदी की छपी नई किताबें मुश्किल से मिलती हैं.
'दो लिबासों में एक ज़ुबान'

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साल 1947 में मुल्क बंटा. उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनी और हिंदी भारत की.
मशहूर शायर अली सरदार जाफ़री ने शान से कहा था, "मौज-ए-हवा को चूमता आया. मेरी ज़बान थी उर्दू-हिंदी."
अतहर मसूद के मुताबिक़ हिंदी-उर्दू दो लिबासों में एक ज़ुबान हैं.
वह इस तरह की कार्यशालाओं को साल में चार बार आयोजित करना चाहते हैं.
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