मनरेगाः क्यों की व्हिसलब्लोअर ने ख़ुदकुशी?

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

मनरेगा में फर्ज़ी बिलों पर हस्ताक्षर के दबावों के चलते एक इंजीनियर ने इसी हफ़्ते ख़ुदकुशी कर ली. इंजीनियर पर 25 लाख रुपए के 'फ़र्जी' बिल के भुगतान पर हस्ताक्षर करने के लिए पंचायत सदस्यों और अधिकारियों की ओर से भारी दबाव डाला जा रहा था.

कर्नाटक के चामराजनगर ज़िले के कोल्लेगल तालुक की कुराट्टिहोसुर ग्राम पंचायत सदस्य सरदार, उनकी पत्नी सरोजम्मा और पंचायत विकास अधिकारी वाइरामनिकयम पर आरोप है कि उन्होंने इंजीनियर पर 'पैमाइश पुस्तिका' पर दस्तखत करने का दबाव डाला.

जूनियर इंजीनियर सुरेश ने ख़ुद को आग लगा ली. उन्होंने इन गड़बड़ियों के बारे में ज़िला पंचायत को बता दिया था और अपने तबादले की भी मांग की थी. मगर दोनों ही चीज़ों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

चमराजनगर के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र प्रसाद कहते हैं, "सरदार, वाइरामनिकयम और सरदार की पत्नी सरोजम्मा ने सुरेश को दस्तखत न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने धमकी दी थी. सुरेश ने खुद को आग लगा ली और वह 90 फ़ीसदी जल गए थे. हमने सरदार और वाइरामनिकयम को गिरफ़्तार कर लिया है."

'सिर्फ़ कंप्यूटर में दिख रहा काम'

जस्टिस संतोष हेगड़े
इमेज कैप्शन, जस्टिस संतोष हेगड़े कहते हैं कि मनरेगा ने पूरे सामाजिक तंत्र को भ्रष्ट कर दिया है.

सुरेश का यह मामला <link type="page"><caption> मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/01/110116_mnarega_salman_pp.shtml" platform="highweb"/></link> की स्थिति बयां करता है. यह कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन का पहला अधिकार-आधारित कार्यक्रम है जो ग्रामीणों को सीमित अवधि रोज़गार प्रदान करता है.

इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं.

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संतोष हेगड़े, कहते हैं, "मनरेगा ने पूरे सामाजिक तंत्र को भ्रष्ट कर दिया है."

जस्टिस हेगड़े कहते हैं, "अगर उस इंजीनियर को कुछ सलाह मिल गई होती, तो वह भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम होते. उनका मामला हताशा का उदाहरण है, क्योंकि वह इस समस्या को दूर नहीं कर सके. अगर मैं लोकायुक्त होता तो मैं एक हेल्पलाइन शुरू करता."

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्डटीज़ (एनआईएएस) द्वारा प्रोफ़ेसर नरेंद्र पाणि और चिदंबरम अय्यर के नेतृत्व में किए गए एक शोध के अनुसार, यह योजना उत्तर-पूर्व कर्नाटक (या पूर्व हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र) में बहुत अच्छे तरीके से लागू की गई है.

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लेकिन इस पिछड़े इलाके में <link type="page"><caption> रोज़गार पाए लोग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/05/110518_world_bank_pds_sy.shtml" platform="highweb"/></link> योजना के बारे में सुना भी नहीं था. जबकि कंप्यूटर रिकॉर्ड्स योजना के कृयान्यवयन को बेहतर दिखा रहे थे.

प्रोफ़ेसर पाणि सकारात्मक जवाब देते हैं, ""आप विभिन्न परिस्थितियों से स्थानीय स्तर पर निपटने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं चला सकते. कर्नाटक के दक्षिणी ज़िलों में रेशम-उत्पादन बहुत लोकप्रिय है. लेकिन मनरेगा में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं है."

वह कहते हैं, "यकीनन इसका पुनर्ठन किया जाना चाहिए. आप किसी राष्ट्रीय योजना को इस तरीके से लागू नहीं कर सकते."

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