'हिंदी तो सबसे बड़ी खलनायक है'

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- Author, चंद्रभान प्रसाद
- पदनाम, लेखक और दलित चिंतक
बात मार्च 2011 की है. कासरगोड की केरल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में "दलितों का अंग्रेज़ीकरण: जाति, उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद के प्रश्न" शीर्षक पर आधारित एक सेमिनार का आयोजन किया गया था.
कार्यक्रम की रूपरेखा डॉक्टर जोसेफ कोयीपल्ली ने तैयार की, जो उस समय यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी पढ़ाते थे. अब डॉक्टर जोसेफ यूनिवर्सिटी में डीन हैं.
एक सत्र के दौरान मैंने भोजपुरी और हिंदी को लेकर अपने अनुभव बताए. मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी बोलने वाले इलाके से आता हूं.
हालांकि वहां ज़्यादातर लोग भोजपुरी बोल लेते हैं, इसके बावजूद छात्र, अध्यापक और सरकारी कर्मचारी अपने कार्यस्थलों और क्लासरूम में हिंदी बोलेंगे.
दलित भी स्कूलों में जा रहे हैं और दलित स्कूल अध्यापक और सरकारी कर्मचारी भी हैं. शहरों में रहने वाले दलित कर्मचारी धीमे-धीमे हिंदी बोलने लगेंगे और भोजपुरी भूल जाएंगे.
इसके बाद ऊंचे तबके के लोग हिंदी बोलने वाले दलित का मज़ाक उड़ाएंगे, "फारसी बोलने वाले इन लोगों को देखो (वास्तव में जाति का नाम लेंगे)."
क्षेत्रीय अनुभव
जैसे ही मैंने अपनी बात खत्म की, महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सनल मोहन ने ऐसी ही बात मलयालम के बारे में कही.
उन्होंने बताया, "दलितों से मलयालम बोलने की उम्मीद नहीं की जाती." प्रोफेसर मोहन एक दलित हैं और जानेमाने विचारक हैं.

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जैसे ही प्रोफेसर मोहन ने अपनी बात खत्म की, एक शिक्षक और दलित डी श्याम बाबू ने तेलुगू और दलित को लेकर ऐसी ही बात कही. श्याम बाबू इस समय दिल्ली स्थिति सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के साथ काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "तेलुगू कुछ जातियों के हिंदुओं से संबंधित है."
देश भर की यात्रा करने पर विभिन्न जातियों के बुजुर्ग मिलेंगे. उनसे आप ये बातें जान सकते हैं कि ज्यादातर लोग बोलियों के जरिए बातचीत करते हैं, जो उनकी शिक्षा, कार्यस्थल या शहर की भाषा से कुछ समानताएं रखती है. ठीक भोजपुरी और हिंदी की तरह.
चूंकि शिक्षा के क्षेत्र में दलितों का प्रवेश देरी से हुआ, इसलिए उनका स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी और कार्यालयों की भाषा पर अधिकार नहीं हो सका.
दाखिले में दिक्कत
जब 1854 में लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली सामने आई तो साथ में एक गंभीर समस्या भी ले आई. जब दलितों ने स्कूलों में दाखिला लेने की कोशिश की तो उन्हें खदेड़ा गया. उनके माता-पिता का पीटा गया और घरों में तोड़फोड़ की गई.
सरकार ने स्कूलों में दलितों के प्रवेश के लिए 1857 में एक आदेश जारी किया, लेकिन वह काम नहीं कर पाया.
करीब 36 साल तक जातिवादी हिंदुओं के साथ चले संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1880 में जाकर दलितों के लिए अलग स्कूल खोलने का फैसला किया.

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1880 के हंटर आयोग ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि कैसे एक समाज ने अपने ही लोगों को शिक्षा व्यवस्था से दूर रखा.
हालांकि यह दर्शाने के लिए विस्तृत अध्ययन की जरूरत है कि हिंदी और सभी विदेशी भाषाएं कैसे दलितों के लिए निषिद्ध थीं. यह साफ है कि संचार के माध्यम के रूप में दलितों का बोलियों पर अधिकार था.
इसके अलावा हिंदी सहित भारतीय भाषाएं उत्पीड़न का माध्यम भी थीं. भारतीय भाषाओं में दलितों के ख़िलाफ़ अनगिनत अपशब्द हैं. अगर इस पर सार्वजनिक विमर्श को फिर से शुरू किया जाए तो कोई भारतीय भाषाओं पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकता है.
भाषा का संबंध
संस्कृति, धर्म और भाषाएं अभिन्न हैं. भारत में इन तीनों में जाति भी जुड़ जाती है.
सावित्री बाई फूले भारत की पहली महिला शिक्षक थीं, जिन्होंने अछूत लड़कियों को स्कूल में भर्ती कराया. उन्होंने एक भारतीय भाषा मराठी के पूर्वाग्रह का अनुभव किया.
सावित्री बाई ने 1854 में 'मदर इंग्लिश' नाम से एक कविता लिखी. कविता में उनके विचार थे:
"पेशवा का शासन चला गया है/ अंग्रेज़ी मां आ गई हैं/ हमारे ऐसे निराशाजनक समय में /मां अंग्रेज़ी आओ, यह तुम्हारा वक़्त है/ यह गरीबों के लिए हर तरह से अच्छा है/ मां अंग्रेज़ी के द्वार पर मनु की मौत/ ज्ञान ही गरीबों के लिए आसरा है/ इससे मां जैसा रिश्ता है."

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भारत में 21वीं सदी के दार्शनिक डॉक्टर बीआर अम्बेडर ने दलितों से अंग्रेज़ी को अपनाने के लिए कहा. उन्होंने कहा, "अंग्रेज़ी शेरनी के दूध की तरह है."
एक दिन जाति का विनाश तय है. भारतीय भाषाओं का विनाश भी होकर रहेगा.
अंग्रेज़ी का बोलबाला
वर्ष 2011 के जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 12.5 करोड़ भारतीय अंग्रेज़ी बोलते थे और इसके साथ ही हिंदी के बाद अंग्रेज़ी भारत में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. करीब 55.1 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं.
इस समय भारत के लगभग सभी तबकों में लोग एक अच्छे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल के लिए घूस देने को तैयार हैं.
कुछ दशकों में लोग भारतीय भाषा बोलने वालों पर हंसेंगे और इसमें अंग्रेज़ी भी शामिल होगी.
हालांकि सभी भारतीय भाषाओं में जातिगत भेदभाव हैं, लेकिन हिंदी तो सबसे बड़ी खलनायक है. ऐसा इसलिए है क्योंकि यह सबसे बड़ी भाषा है.
इतना ही नहीं, पूरे भारत में एक भाषा के तौर अंग्रेज़ी को अपनाने से देश अधिक एकजुट होगा.
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