हाथियों से भरे जंगल का सफ़र

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- Author, पी साईनाथ
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
हम ऊंची घासों और कई पेड़ों वाले उस मैदान में तकरीबन एक घंटा बिता चुके थे और हमारे साथ-साथ था एक जंगली हाथी भी जिसे हम देख नहीं पाए थे.
हम आठ लोग थे जो केरल के सुदूर जंगलों में स्थित इदामालकुड़ी पंचायत जा रहे थे और साथ चलते हाथी को देख नहीं पाए थे.
हालांकि हमारे साथ जो ग्रामीण थे वो उस जंगली हाथी की हर गतिविधि पहचान रहे थे. हम बार बार ग्रामीणों के मुंह से अनाई अनाई (हाथी, हाथी) सुनते पर हाथी को देख नहीं पाते.
आसपास के गांवों वाले लोग ऊंची आवाज़ में चेतावनी देते कि पानी के पास कोई न जाए. रास्ते में मिलते हुए आदिवासी हमें बताते जाते, "वो नदी के पास ही है. ध्यान से जाना."
ये आदिवासी सोसायटीकुडी जा रहे हैं जहां से हम आ रहे हैं. उनकी चेतावनी से राहत तो नहीं ही मिल रही थी. हम पास के खेतों में चले गए, आवाज़ें आती रहीं.
'जंगल वाले दोस्त'

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हमारे ‘जंगल वाले दोस्त’ अच्युतन को हाथी की लोकेशन के बारे में पूरा आभास था. अच्युतन भी मुथवन आदिवासी हैं. लग रहा था कि कुछेक दूरी पर पेड़ों पर बने मचानों की मदद से हाथी पर नज़र रखी जा रही है और वहीं से लोग ऊंची आवाज़ में चेतावनी दे रहे हैं.
एक अकेला हाथी अच्छी ख़बर नहीं होती है. बहुत संभव है कि वो ‘मस्त’ वाली स्थिति में हो और हाथियों के नाराज़ झुंड ने उसे झुंड से निकाल दिया हो.
वो ऐसा क्षण था जब हमें हाथियों से जुड़ी सारी बुरी ख़बरें याद आ रही थीं. याद आया कि जब हाथी मस्त वाली स्थिति में होता है तो उसके टेस्टोस्टेरोन स्तर सामान्य से साठ गुना अधिक बढ़ जाते हैं और इस ऊर्जा को वो लड़ने में ख़र्च करता है.
हममें से शायद ही कोई इस मस्त हाथी से लड़ना चाहता था इसलिए हमने एक पेड़ की छांव में शरण ली. जब कभी पेड़ों के बीच कुछ हलचल होती, हम सोचते, ये हमारे जंगल वाले दोस्त हैं या फिर.....इन कुछ घंटों में हम इदुक्की के सुंदर जंगलों के नज़ारे का आनंद भी उठा नहीं पाए.
हमें अपना सबक मिल गया था, कभी भी ऐसी जगह पर शार्ट कट का इस्तेमाल न करें जिस जगह को आप न जानते हों. यह आपदा हो सकती है. हम कोच्चि से निकले थे और मुन्नार में रात रुके थे. पेट्टीमुडी तक हम कार से आए और उसके बाद हमने शुरू की 18 किलोमीटर की यात्रा पहाड़ों से होकर इदामालकुडी की.
हाथियों के इलाके में

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पंचायत में इंटरव्यू ख़त्म कर के हमने सोचा कि हम चतुर हो गए हैं. हमने सोचा कि क्यों फिर वापस जाएं 18 किलोमीटर वापस. हमने सोच कि क्यों न शॉर्ट कट लेकर दूसरी दिशा में वलपरई की तरफ चलें जाएं जो तमिलनाडु के कोयंबटूर ज़िले में है. ये रास्ता पहाड़ियों वाला है पर है बस आठ-दस किलोमीटर. वलपरई से फिर सड़क मार्ग से कोच्चि और फिर मुन्नार.
लेकिन ये रास्ता हाथियों के इलाके वाला था और हम फंस गए थे.
आख़िरकार पास के एक गांव से तीन युवा आदिवासी पहुंचे और हमें लेकर चले एक कतार में. इन तीनों में से एक के हाथ में छोटा सा बैग था जिसे उसने कस कर पकड़ रखा था.
कुछ मिनटों के बाद छोटे धमाके जैसी आवाज़ हुई और हमें समझ आया कि बैग में पटाखे हैं. इसके जवाब में हाथी की कोई आवाज़ नहीं आई.
कैसे इतना विशालकाय जीव अदृश्य सा रह सकता है? लेकिन कुछ ही मिनटों में हमें लेकर जा रहे लोगों ने कहा कि अब हम आगे बढ़ सकते हैं. नदी को पार कर सकते हैं.
हाथियों को पटाखों की आवाज़ पसंद नहीं. हालांकि नदी पार करने के बाद भी हम हाथी को देख नहीं पाए. नदी के दूसरी तरफ भी नहीं. हां पास में हमने हाथी का मल ज़रूर देखा, ढेर सारा.
लेकिन हम रुक कर ये देखने की जहमत नहीं उठाना चाहते थे कि ये मल ताज़ा है या पुराना.
एकमात्र विकल्प

हमें पता चला कि हाथियों के झुंड ने वही रास्ता लिया है जिस रास्ते के ज़रिए हम वलपरई जाना चाह रहे थे. आदिवासी, यहां तक कि हमें रास्ता दिखा रहे लोग भी, इस रास्ते पर जाना नहीं चाहते थे.
हमारे पास बस एक विकल्प था, लंबा रास्ता पकड़ा जाए जो पहाड़ियों और चढ़ाई से भरा हुआ था. इस रास्ते पर लगा कि हम लगातार अपने घुटनों पर रेंग रहे हों. रास्ते पर ही हमने समझा कि पहाड़ों पर पुराने जूतों का ही इस्तेमाल करें. मैं नए जूतों का इस्तेमाल किया और भुगत रहा था.
आठ किलोमीटर की यात्रा पच्चीस किलोमीटर की यात्रा जैसी लग रही थी. भारी बैग और बैकपैक, कैमरा, पानी से भरा हुआ. हमें आठ घंटे लगे यात्रा पूरी करने में.
इदामलयार नदी के पास हमने आधे घंटे आराम किया लेकिन कोई हाथी नहीं दिखा. हमारी किस्मत अच्छी थी कि मौसम सूखा था. अगर बारिश का मौसम होता तो खून चूसने वाले जोंकों का सामना अलग करना पड़ता.
हम जब वलपरई पहुंचे तो हम पिछले 36 घंटों में पेट्टीमुडी से 40 किलोमीटर चल चुके थे. लेकिन हमें लग रहा था कि हम 100 किलोमीटर चले हैं लेकिन अभी तक हम कोई हाथी देख नहीं पाए थे.
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