मोदी की पहल के पीछे पड़ोस का बाज़ार?

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
शायद ही किसी को उम्मीद होगी कि हिन्दू राष्ट्रवादी नेता नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करते समय दक्षिण एशिया ने नेताओं को बुलाने का अभूतपूर्व क़दम उठाएंगे.
कुछ टीकाकारों ने पाकिस्तान और श्रीलंका समेत दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस या सार्क) के नेताओं को निमंत्रण को एक कूटनीतिक चाल बताया है.
चुनावी नतीजों से मिले नतीजों को देखें तो उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार है.
<link type="page"><caption> कौन-कौन हैं मोदी के मेहमान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2014/05/140525_modi_oath_guest_list_galley_pk.shtml" platform="highweb"/></link>
लोकसभा 2014 के अपने चुनावी भाषणों में बीजेपी के नेता ने जनता से अर्थव्यवस्था सुधारने का वादा तो किया लेकिन इस चुनाव में विदेश नीति तो कोई मुद्दा नहीं बन पाई.
वादे
हालांकि रोज़गार के अवसर मुहैया कराने से लेकर बुनियादी सुधारों की बात लगभग बीजेपी के हर नेता ने अपने भाषण में कही.
तो फिर अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही मोदी की ओर से ये कूटनीतिक पहल क्यों?
विश्लेषक मानते हैं कि मोदी की विदेश नीति की इस पहल का मुख्य कारण अर्थव्यवस्था ही है.
एक अंग्रेजी अख़बार 'मिंट' के अनुसार भारत से दक्षिण एशियाई देशों में होने वाला निर्यात 17.3 अरब डॉलर है जबकि पूरे विश्व में भारत 312 अरब डॉलर का निर्यात करता है.
विश्लेषकों का मानना है कि इस पहल से मोदी इस अंतर को पाटना चाहते हैं.

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अंग्रेजी दैनिक 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के संपादकीय में लिखा गया, "अगर भारत आर्थिक रूप से आगे बढ़ने की चाह रखता है तो चीन समेत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाना एक अहम क़दम होगा."
चुनौतियां
ये साफ़ है कि भारत अपने पड़ोसी देशों में बाज़ार की भारी संभावनाएं देखता है लेकिन पिछली सरकारें ने इन संभावनाओं का दोहन करने में नाकाम रही.
भारत भौगोलिक और आर्थिक दोनों ही रूप से दक्षिण एशियाई देशों में सबसे बड़ा देश है. इसके बावज़ूद पिछली सरकारें दक्षिण एशियाई देशों में एकजुटता लाने में नाकाम रही.
लेकिन क्या मोदी इस मोर्चे पर अपने पूर्ववर्तियों से अलग कर पाएंगे?
विश्लेषक मानते हैं कि मोदी के सामने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ सीमा पर होने वाले तनावों से निपटना और दूसरे पड़ोसियों के साथ मुद्दों को सुलझाना एक बड़ी चुनौती होगी.
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीतियों को काफ़ी झटके लगे हैं. ज़ाहिर है इसका सीधा संबंध पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकार की अपनी आंतरिक मज़बूरियां थीं.
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वैसे पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए मनमोहन सरकार ने कई क़दम उठाए जिनमें इस्लामाबाद के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी शामिल थी.
लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि इन क़दमों का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला. इसका कारण भारत में मनमोहन सरकार की मज़बूरियां और पाकिस्तान में सत्ता प्रतिष्ठान के आंतरिक कलह हैं.

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मोदी की पार्टी बीजेपी और कुछ कांग्रेसियों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते तब तक नहीं सुधर सकते जब तक वह 2008 में मुंबई में हुए चरमपंथी हमले के गुनाहगारों को सज़ा नहीं दे देता.
भारत का मानना है कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठनों का हाथ है.
पाकिस्तान का कहना है कि वह कार्रवाई के लिए तैयार है लेकिन भारत को और सबूत देने की ज़रूरत है. इसके अलावा पाकिस्तान हमेशा से ये कहता आया है कि भारत को द्विपक्षीय बातचीत में 'कश्मीर मुद्दे' को सुलझाना चाहिए.
कश्मीर पर दोनों देश अपना हक़ जताते आए हैं और यह दोनों देशों के बीच पिछले 60 साल से भी अधिक समय से विवाद का विषय बना हुआ है.
भारत-पाक रिश्ते

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विश्लेषकों का मानना है कि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की मौजूदगी दोनों देशों के रिश्तों में एक नई शुरुआत होगी.
लेकिन सवाल ये है कि क्या दोनों देश व्यापारिक रिश्तों को विवादों से अलग कर पाएंगे?
मोदी और शरीफ़ को 'व्यापारिक सोच' रखने वाले नेताओं के रूप में देखा जाता है. संभव है कि आने वाले समय में दोनों नेता सोच समझ कर और धीरे-धीरे रिश्तों को सुधारने की ओर कदम बढ़ाएं.
विश्लेषकों का मानना है कि दोनों के बीच बरसों से चले आ रहे मुद्दों को पूरी तरह अलग नहीं रखा जा सकता है लेकिन भविष्य में व्यापार को ज़्यादा तरजीह मिल सकती है.
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सरहद के दोनों तरफ कई लोग इसे क्षेत्रीय एकता की दिशा में एक अहम क़दम मानते हैं.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर पी सहदेवन ने ज़ी न्यूज़ से कहा, "यूरोपीय संघ ने जैसे यूरो के संबंध में किया गया वैसा ही दक्षिण एशियाई देशों का आर्थिक एकीकरण होना चाहिए. साथ ही नागरिकों के बीच सीधे संपर्क के लिए उदार नीतियां होनी चाहिए."
इसके अलावा भारत को अन्य पड़ोसी देशों बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल और बर्मा के साथ भी अपने संबंधों को नया आयाम देने की ज़रूरत है.
नेपाल, मालद्वीप और भारत

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साल 2011 में मनमोहन सिंह की सरकार बांग्लादेश के साथ पानी के बंटवारे को लेकर हुए समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर पाई थी जिससे दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित हुए थे.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस समझौते का विरोध किया था और यूपीए गठबंधन को छोड़ने की धमकी दी थी.
इससे मनमोहन सिंह की स्थिति कमज़ोर हो गई और समझौता रद्द हो गया.
श्रीलंका के मामले में मनमोहन सरकार को यूपीए में शामिल तमिल पार्टियों को ख़ुश रखने के लिए कई बार अपने हाथ खींचने पड़े.
यहां तक कि मनमोहन को पिछले साल नवंबर में कोलंबो में हुए राष्ट्रमंडल देशों के प्रमुखों की बैठक में हिस्सा नहीं लिया था.
तमिल पार्टियों का आरोप है कि श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान तमिलों पर हुए अत्याचार के लिए श्रीलंका सरकार ज़िम्मेदार है.
प्राथमिकता
श्रीलंका के साथ अच्छे संबंध बनाना मोदी की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे के शपथ ग्रहण में शामिल होने के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
भारत को साथ ही नेपाल और मालदीव में भी स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी. हाल ही में दोनों देशों में राजनीतिक उथल पुथल की स्थिति रही थी.
विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली के पास इतनी क्षमता है, या यूं कहें की ज़िम्मेदारी है कि वह दक्षिण एशियाई देशों में भी वैसी ही एकता के लिए काम करे जैसी यूरोपीय देशों में है.
अंग्रेज़ी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स में छपे एक लेख में पूछा गया कि, "ऐसा क्यों है कि भारत के अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंध नहीं हैं. ऐसा तब है जबकि उसके पास ऐसी आर्थिक संभावना है कि वह न केवल नागरिकों बल्कि दक्षिण एशियाई देशों के नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार ला सकता है."
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