केजरीवाल की रिहाई पर मंगल को सुनवाई

अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

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दिल्ली उच्च न्यायालय आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को जेल से फ़ौरन रिहा करने संबंधी याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करेगा.

भारतीय जनता पार्टी के नेता नितिन गडकरी के मानहानि मामले में ज़मानत के लिए निजी मुचलका नहीं भरने के कारण अदालत ने केजरीवाल को न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया था.

केजरीवाल की रिहाई के लिए दायर की गई याचिका में कहा गया है कि उन्हें 'ग़ैर-कानूनी तरीके से न्यायिक हिरासत में' भेजा गया है.

आम आदमी पार्टी के नेता और वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण की ओर से यह याचिका न्यायमूर्ति बीडी अहमद और न्यायमूर्ति एस मृदुल की पीठ के समक्ष दायर की गई जिसे अदालत ने मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है.

याचिका में 21 मई और 23 मई के उन आदेशों को चुनौती दी गई है जिनमें ज़मानती मुचलका नहीं भरने पर केजरीवाल को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया था.

याचिका में कहा गया है कि इस मामले में ज़मानती मुचलका भरना ज़रूरी नहीं है और सिर्फ़ हलफ़नामे की बुनियाद पर केजरीवाल को रिहा किया जा सकता था.

सवाल क़ानून की व्याख्या का

केजरीवाल की ओर से दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में भारतीय जनता पार्टी के नेता नितिन गडकरी और दिल्ली सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है.

नितिन गडकरी

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बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का इस्तेमाल किसी बंदी या क़ैदी को अदालत के सामने पेश करने के लिए किया जाता है ताकि अदालत यह तय कर सके कि उस क़ैदी या बंदी को हिरासत में लिया जाना क़ानून सम्मत है या नहीं.

याचिका में कहा गया है कि मजिस्ट्रेट ने ''यह मानकर आदेश जारी किए कि जब कोई अभियुक्त तलब किए जाने पर हाज़िर होता है, तब उसे मुचलका भरना ही चाहिए और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे आवश्यक रूप से न्यायिक हिरासत में भेजा जाएगा.''

याचिका में यह भी कहा गया है कि क़ानून की यह समझ ''पूरी तरह से भ्रम पैदा करने वाली है.''

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गडकरी मानहानि मामले में ज़मानती मुचलका नहीं भरने की वजह से 21 मई को दो दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेजा गया था.

इसके बाद 23 मई को उनकी हिरासत अवधि 14 दिन के लिए छह जून तक बढ़ा दी गई थी.

इतना ही नहीं, संबंधित न्यायाधीश ने अपने 21 मई के आदेश पर दोबारा विचार करने से भी मना कर दिया था और केजरीवाल से कहा था कि फ़ैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में अपील करें.

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