'दमघोटू वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ हिंदू राष्ट्रवादी विपक्ष'

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लेखक और पत्रकार साइमन डेनयर लिखते हैं, "भारत के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत ने साबित कर दिया है कि भारत का जनतंत्र अच्छे प्रशासन के लिए जनादेश दे सकता है."
दुनिया भर में भारतीय लोकतंत्र लगातार ग़लत वजहों से सुर्ख़ियों में रहा है, जिनमें से कुछ समझे जाने लायक वजहें हैं.
इस बहस के केंद्र में राजनेताओं को भ्रष्टाचार और संरक्षण देने के मामले, नीति की जगह लोकप्रियता, संसद का अक्सर स्थगित होना और मर्यादाहीन विरोध प्रदर्शन रहे हैं.
पिछले एक दशक में कांग्रेस की दमघोटू वंशवादी राजनीति जो ऐसा लगता है विश्वास और स्थिरता खो चुका था, के ख़िलाफ़ एक हिंदू राष्ट्रवादी विपक्ष खड़ा हुआ है.
गठबंधन का दौर
दोनों ब्रांडों के बीच एक ठोस राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा लिखने के संघर्ष के बीच क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियों ने खाई को भरा था.
मगर यह राजनीति अब ढलान पर है और ऐसा लगता है गठबंधन सरकार के तहत कमज़ोर और दिशाहीन शासन का दौर ख़त्म हो गया है.
मतदाताओं ने केवल अपने संकीर्ण हितों को देखा है, जिसके बारे में आमतौर पर कहा जाता है लोग सिर्फ़ अपनी जाति को मत देने के लिए मत देते हैं.

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उद्यमी वर्ग सिर्फ़ यह चाहता था कि सरकार उनको अकेला छोड़ दे और वे शायद ही मत देते थे.
चीन में कई लोग भारतीय जनतंत्र को निर्णायक और सत्तावादी शासन के तौर पर देख रहे हैं.
हालांकि 2014 के आम चुनाव ने, भारत का लोकतंत्र निर्णायक रूप से गिरावट की ओर है, का मिथक तोड़ दिया है.
लोकतंत्र में गिरावट
स्थापित पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में दशकों से मतदान एक दीर्घकालिक गिरावट की ओर रहा है, वहीं भारत में मतदान में महिलाओं की अधिकाधिक भागीदारी से, और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं की बदौलत 66.5 फ़ीसदी का रिकॉर्ड मतदान हुआ.
देश में तेज़ी से बढ़ते मध्यम वर्ग के बीच भी इसे लेकर उत्साह पाया गया. बदलाव की ज़मीन सालों से तैयार हो रही थी.
चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने राजनीति को सनसनी में तब्दील कर दिया है, लेकिन इसने भ्रष्टाचार के मामलों को बेनकाब करने में मदद की है.
सूचना के अधिकार ने ग़रीब भारत की जनता को नौकरशाही के ख़िलाफ़ सवाल पूछने का अधिकार देकर सशक्त बनाया है.

बूढ़े और जवानों ने एकजुट होकर हज़ारों की संख्या में सड़कों पर निकलकर भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन किया.
भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी ने इस विरोधी लहर बखूबी लाभ उठाया. उन्होंने उन सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां उनको जीतने की उम्मीद थी और लोकसभा में बड़ी चतुराई से 31 फ़ीसदी मत लेने में कामयाब रहे.
राष्ट्रीय पृष्ठभूमि में राजनीति
लेकिन सबसे अहम रहा कि यह चुनाव स्थानीय मुद्दों और जाति आधारित नहीं रहा. यह राष्ट्रीय पृष्ठभूमि में लड़ा गया चुनाव था, जिसमें भ्रष्ट और अकुशल सरकार को ख़ारिज कर दिया गया है.
जनादेश में एक ऐसे व्यक्ति में विश्वास जताया गया, जो साफ़, निर्णायक नेतृत्व, अच्छा प्रशासन और विकास का दावा करता है.
मोदी सब्सिडी की राजनीति से अलग हैं और इसके बजाए सभी वर्गों के भारतीयों अमीर और ग़रीब, शहरी और ग्रामीण को शिक्षा, नौकरियों और इससे अधिक मौलिक मसलों एक बेहतर जीवन, बिजली और साफ़ पानी जैसी उनकी आकांक्षाएं साकार करने का मौक़ा देने का वादा करते हैं.
अपने अभियान में मोदी ने एक शक्तिशाली ब्रांड बनाया है और एक महत्वाकांक्षी वादा किया है.
उम्मीदों पर खरा उतरना मोदी के लिए इतना आसान नहीं होगा, लेकिन उनको मिला जनादेश स्पष्ट है.
भारतीय मतदाताओं ने अपने नेताओं को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वे भ्रष्टाचार के बजाय शासन और दान के बजाय अवसर चाहते हैं.
भारत के लोकतंत्र ने अपना काम किया है और उसका संदेश साफ़ है. अब यह मोदी के ऊपर है कि उन्होंने जो वादा किया है वे पूरा करें.
(साइमन डेनयर 'रॉग एलिफ़ेंटः हारनेसिंग द पावर ऑफ़ इंडियाज़ अरूली डेमोक्रेसी' के लेखक हैं. उन्होंने भारत में पत्रकारिता करते लंबा वक़्त गुजारा है और फ़िलहाल चीन में वाशिंगटन पोस्ट के ब्यूरो चीफ़ हैं.)
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