कश्मीर में 'मोदी सरकार को लेकर आशंकाएं'

जम्मू-कश्मीर (फ़ाइल)

इमेज स्रोत, AP

    • Author, बशीर मंज़र, श्रीनगर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

ऐतिहासिक जीत के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं तो भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर घाटी इसे कुछ उम्मीद, कुछ डर और सतर्कता के साथ देख रही है.

घाटी की तीनों सीटें जीतने वाली पीडीपी यानी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल नहीं होगी. लेकिन पार्टी ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर की 'समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान' के लिए वह केंद्र से सहयोग करेगी.

जेके पीपुल्स कॉंफ्रेंस के सज्जाद लोन कहते हैं, "बदलाव हमेशा बेहतर होता है. कश्मीर के संदर्भ में हम उम्मीद करते हैं कि वह (मोदी) पारंपरिक तरीकों को अपनाने की बजाय पुरानी समस्याओं के नए समाधान लेकर आएंगे."

'गुजरात प्रयोग का डर'

लोन की पार्टी के एकमात्र उम्मीदवार बारामुला लोकसभा सीट पर तीसरे स्थान पर रहे. लेकिन उन्हें 71 हज़ार वोट हासिल हुए जो काफ़ी अच्छी संख्या है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "सबसे अच्छी स्थिति वह होगी कि मोदी वाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति पर चलें."

उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व की परीक्षा (कश्मीर के संदर्भ में) यह सुनिश्चित करना होगा कि कश्मीर नीति सीधे प्रधानमंत्री बनाएं, इसे अफ़सरशाही के भरोसे न छोड़ा जाए.

जेकेएलएफ़ यानी जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन, मोहम्मद यासिन मलिक, को लगता है कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिले ज़बरदस्त बहुमत ने भारत को दोराहे पर खड़ा कर दिया है 'जहां से यह देश किसी भी दिशा में जा सकता है.'

यासिन मलिक

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, यासिन मलिक को डर है कि बीजेपी आरएसएस का एजेंडा लागू करना चाहेगी.

मलिक की जेकेएलएफ़ एक संयुक्त और स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर के लिए संघर्ष कर रही है.

उन्होंने कहा कि आरएसएस भारतीय जनता से उन्हें स्पष्ट बहुमत देने के लिए कहती रही है ताकि वह अपना तीन सूत्रीय कार्यक्रम लागू कर सके - मुस्लिम पर्सनल लॉ क़ानून को हटाकर समान नागरिक संहिता लागू करना, राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारत में पूरी तरह विलय करना.

मलिक कहते हैं, "अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत की नई सरकार आरएसएस का ख़तरनाक कार्यक्रम लागू करेगी. क्योंकि अगर वह ऐसा करती है तो इससे पूरे क्षेत्र में आग लग जाएगी."

हालांकि वह जल्दी ही यह भी जोड़ देते हैं, "वैसे इस बारे में पहले ही धारणा बना लेना समझदारी नहीं होगी क्योंकि समय ही सबसे अच्छा निर्णायक होता है."

लेकिन आम लोगों की प्रतिक्रिया मिली-जुली है. विश्वविद्यालय में शिक्षक मोहम्मद अशरफ़ कहते हैं, "मुझे तो सबसे ज़्यादा चिंता भारत के मुसलमानों को लेकर है. मुझे डर है कि मोदी मुसलमानों को दबाने के लिए देश भर में 'गुजरात प्रयोग' कर सकते हैं."

मजबूत सरकार से उम्मीद

हालांकि वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार मंज़ूर अंजुम पूरे घटनाक्रम को अलग नज़र से देखते हैं.

वह कहते हैं, "हमने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व बीजेपी-नीत एनडीए का शासन देखा है. उसी वक़्त हमने कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान को नज़दीक आते देखा था."

अटल बिहारी वाजपेयी, परवेज़ मुशर्रफ़

इमेज स्रोत, AP

उनका मानना है कि कश्मीर जैसे मुद्दे से निबटने के लिए भारत में एक मज़बूत और स्थायी सरकार होनी चाहिए, "यूपीए सरकार ने कश्मीर मुद्दे पर कुछ प्रयोग किए लेकिन वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि वह एक कमज़ोर सरकार थी."

अंजुम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का, उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने कार्यसमूहों को गठित करने जैसी पहल की लेकिन अंतिम समय में पीछे गट गए.

वह ज़ोर देकर कहते हैं, "इन सभी कार्यसमूहों और वार्ताकारों की रिपोर्टें अब धूल खा रही हैं क्योंकि सरकार में इन्हें लागू करने की हिम्मत नहीं है."

आम लोग आने वाले दिनों के घटनाक्रम पर बेहद उत्सुकता से नज़र रखेंगे. कुछ लोगों को चिंता है कि अनुच्छेद 370, जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता है, को हटाने का बीजेपी का बहुप्रतीक्षित सपना अब हकीकत में बदल सकता है तो कुछ को यकीन है कि मोदी सरकार ऐसी विपदा मोल नहीं लेगी.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>