इतनी मीडिया कवरेज से कोई फ़र्क पड़ा?

भारतीय मीडिया, सीईसी, वीएस संपत

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    • Author, डॉक्टर एन भास्कर राव
    • पदनाम, चेयरमैन, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़

क्या 2014 के चुनावों का संचालन मीडिया के हाथ में रहा है? या फिर यह कहना ज़्यादा सही होगा कि यह पूरी तरह मोदी ने इनका संचालन किया! हालांकि कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि केजरीवाल इनका संचालन कर रहे थे, क्योंकि चुनाव प्रचार के पहले महीने में वह मोदी से भी ज़्यादा समाचार चैनलों में दिखाई दिए हैं.

इसके बाद मोदी की कवरेज बढ़ गई क्योंकि एक के बाद एक सर्वेक्षणों में आया कि वह चुनावी दौड़ में आगे हैं.

मीडिया कवरेज के लिहाज से देखें तो शायद ही कोई अन्य नेता होगा जो राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दिया हो. लेकिन क्यों मीडिया पर बार-बार "एक लहर की कवरेज" करने का आरोप लगाया गया. या, क्यों दूसरे कह रहे हं कि तीसरा मोर्चा "मीडिया में ही ज़्यादा" है.

सोशल मीडिया ने भी 2014 चुनाव प्रचार की रंगत बदली है, लेकिन वृहत स्तर पर.

एक बात तो तय है. किसी भी देश में न्यूज़ मीडिया का इतना समय और स्थान राष्ट्रीय चुनावों को कवर करने में नहीं गया होगा- 100 दिन से ज़्यादा!

निष्पक्ष मीडिया ज़रूरी

ऊपरी तौर पर देखकर तो कहा जा सकता है कि यह अच्छी बात है कि भारतीय लोकतंत्र जीवंत है. इतनी कवरेज सिर्फ़ इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि भारत में बहुत सारे चौबीस घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल हैं या बहुत से अख़बार हैं.

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बल्कि मई के अंत तक (जब तक नई सरकार अस्तित्व में नहीं आ जाती) न्यूज़ चैनल अपने समय का 55 से 75 फ़ीसदी चुनाव कवरेज को देंगे और अख़बारों ने 100 दिन तक आराम से अपने स्थान का 15 से 20 फ़ीसदी चुनाव कवरेज को दिया होगा.

और फिर इससे पहले कभी भी भारतीय न्यूज़ मीडिया ने 100 दिन के अंदर इतने 'मत सर्वेक्षणों' को नहीं दिखाया होगा.वह भी ऐसे वक्त में जब ऐसे सर्वेक्षणों पर कई चीज़ों को लेकर उठाए जाने वाले सवाल और भी बढ़ गए हैं- जिनमें उनकी विश्वसनीयता और औचित्य भी शामिल है.

कई सर्वेक्षणों पर, जिस तरह के वह सैंपल लेने का दावा किया गया है, पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च किए गए होंगे (यह पैसा किसने दिया होगा, यह एक अलग मुद्दा है). लेकिन फिर यह कहा जा सकता है कि यह तो कुछ भी नहीं है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में कुल खर्च 30,000 करोड़ से ज़्यादा होगा!

वस्तुतः इससे पहले भारतीय चुनावों में कभी भी मीडिया पर इतना पैसा खर्च नहीं किया गया, वह भी प्रधानमंत्री पद के एक घोषित उम्मीदवार को केंद्र में रखकर.

सवाल यह है कि 2014 लोकसभा चुनावों को सचमुच में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने और बेहतर प्रशासन देने के लिए बदलाव के वाहक के रूप में पेश करने की मीडिया की इन कोशिशों से क्या फ़र्क पड़ा? क्या इनका कोई असर हुआ है?

भारतीय नागरिक

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बेहद दबाव में काम कर रहे देश के स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया से चुनावों को लेकर इतने व्यापक स्तर पर तल्लीन हो जाने से क्या उम्मीद की जा सकती है? कम से कम यह तो उम्मीद की जा सकती है कि न्यूज़ मीडिया काम करते हुए इस तथ्य को लेकर सतर्क रहता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने का स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया.

पेड न्यूज़

इससे भी ज़्यादा ठीक बात यह है कि इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि मतदाताओं की मुद्दों की कवरेज अब पहले से बेहतर है. लेकिन दूसरी ओर, 2014 के चुनावों में नफ़रत के बयानों से भरी जंग में पार्टियों से शीर्ष नेता भी शामिल नज़र आए- इसके चलते मीडिया में भी यही चीजें दिखीं और न्यूज़ चैनल इसका फ़ायदा उठाते ही दिखे.

मतदाताओं की चिंताओं या देश के सामने मौजूद वास्तविक मुद्दों या पार्टी मैनिफ़ेस्टो में रखे गए प्रस्तावों की आनुपातिक कवरेज बिल्कुल भी हीं हुई. मीडिया का बढ़ा हुआ स्थान और निजी विवादों को टीआरपी हासिल करने के लिए उछालना पहले की तरह ही था.

ऐसा लग रहा था सारा न्यूज़ मीडिया इस जुगलबंदी में साथ है और एक तरह से विवादों का आरोपी (गढ़ने के लिए) है.

न्यूज़ चैनलों की बेहद खर्चीले रोड शो की कई घंटे और चुनाव आयोग आचार संहिता का सीधे-सीधे उल्लंघन कर नामांकन तक कवरेज के लिए आलोचना की गई.

इन चुनावों के दौरान करीब एक हज़ार 'पेड न्यूज़' की शिकायतें आईं जिनमें से एक चौथाई को चुनाव आयोग ने पुष्टि करने के बाद नोटिस भी भेजा.

भारतीय समाचार चैनल

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क्या इससे कोई फ़र्क पड़ा? क्या यह बहस सार्वजनिक रूप से 2009 के चुनावों से जारी नहीं है!

चैनलों के बीच प्रतियोगिता की मजबूरी के अलावा न्यूज़ चैनलों की कवरेज में कोई भी विविधता या संवेदनशीलता नज़र नहीं आती. कवरेज की प्रवृत्ति पहले की तरह पांडित्यपूर्ण और गणना आधारित रहती है.

अब तो और भी ज़्यादा, शायद इसलिए कि सबको यही लगता है कि ज़्यादा कवरेज से लोग ज़्यादा ख़ुश होंगे. यकीकन, उनके लिए, मतदाताओं या चुनावी प्रक्रिया के लिए नहीं.

मीडिया संचालित चुनाव होने के बावजूद 2014 के चुनाव प्रचार से बमुश्किल ही चुनाव की गुणवत्ता में कोई फ़र्क पड़ा हो, और न ही पहले ज़्यादा स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए या मतदाताओं का चुनाव ज़्यादा बेहतर हुआ.

मुझे याद है कि 1977 में आपातकाल ख़त्म करने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने क्या कहा था, "जब आपको सिर्फ़ झुकने को कहा गया, बहुत से रेंगने लगे."

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