मोदी से दूर नीतीश, नीतीश से दूर मुसलमान?

नीतीश कुमार धरना

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    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बिहार की आबादी में लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा मुसलमानों का है. आबादी का बड़ा हिस्सा होना और पूरे राज्य में फैला होना इस अल्पसंख्यक समुदाय को राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बना देता है.

जहाँ एक ओर यह माना जाता है कि एमवाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के कारण ही लालू प्रसाद यादव बड़ी राजनीतिक ताकत बने हुए हैं. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू ने भी मुस्लिम मतों के भरोसे ही पिछले साल भाजपा से गठबंधन तोड़ा था.

विश्लेषकों के अनुसार जदयू का गणित यह था कि भाजपा से गठबंधन टूटने पर होने वाले सवर्ण मतों के नुकसान की भरपाई पार्टी मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद बन कर सकेगी.

गठबंधन टूटने के बाद जानकारों को लगने लगा था कि मुस्लिम समुदाय आम चुनाव में जदयू के साथ जा सकता है क्योंकि यह पार्टी सांप्रदायिकता के मुद्दे पर ही एनडीए से बाहर हुई थी लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

इस्तेमाल

राजनीतिक कार्यकर्ता अरशद अजमल कहते हैं, "सेक्यूलर विकल्पों में मुसलमान लालू को मजबूती के साथ खड़ा देख रहे हैं जहाँ उनके साथ यादव भी हैं. वहीं नीतीश कुमार ने साथ उन्हें कोई ऐसा मजबूत समर्थक वर्ग दिखाई नहीं दे रहा है."

अरशद के अनुसार अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के रुप में नीतीश कुमार ने अपना नया आधार तैयार करने का प्रयास किया लेकिन वह पूरी मजबूती से जदयू के साथ खड़े दिखाई नहीं दे रहे.

अख़तरुल इमान

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मुस्लिम समुदाय की यह समझ तब और पुख्ता हुई जब पिछले महीने किशनगंज लोकसभा क्षेत्र के जदयू प्रत्याशी अख्तरुल ईमान सेकुलर मतों के बिखराव को रोकने के तर्क के साथ चुनाव मैदान से हट गए.

जदयू के लिए यह करारा झटका था. सूबे की 40 में से 34 सीटों पर मतदान होना बाकी था. अख्तरुल ईमान के पहले जदयू सांसद साबिर अली के बागी होने से भी यह संदेश गया था कि जदयू के मुस्लिम प्रत्याशी अपनी जीत को लेकर बहुत आशावान नहीं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद भी अरशद अजमल के तर्कों से सहमत हैं. वह कुछ और कारण गिनाते हैं कि क्यों जदयू मुसलमानों की पहली पसंद नहीं है.

सुरूर कहते हैं, "जदयू ने राजद से कई मुस्लिम नेताओं को तोड़कर मुस्लिम बहुल इलाकों में यूपीए के खिलाफ खड़ा किया. इससे मुसलमानों में यह संदेश गया कि जदयू यूपीए को हराने के लिए मुस्लिम उम्मीदवारों का इस्तेमाल कर रहा है."

सुरूर के अनुसार ऐसा करके नीतीश सही राजनीतिक संदेश नहीं दे पाए और ऐसा लग रहा है कि मुसलमान जदयू से और दूर हो गए हैं. ख़ासकर पहले चरण के मतदान के बाद.

वह साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि बाहरी मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट देना लेकिन अपने एकमात्र मुसलमान सांसद मोनाजिर हसन को मौका नहीं देना भी जदयू के लिए उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है.

संभावनाएं

modi nitish

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लेकिन जदयू की बिहार इकाई के उपाध्यक्ष सैयद अफजल अब्बास इन आकलनों से इत्तेफाक नहीं रखते. वह कहते हैं कि किशनगंज में जो कुछ हुआ उसका असर सिर्फ़ संबंधित लोकसभा क्षेत्र तक ही सीमित है, बिहार के मुसलमान नीतीश सरकार के काम के आधार पर जदयू के साथ हैं. नीतीश सरकार ने सारे समुदाय को आगे बढ़ाने का काम किया है.

अब्बास के दावों का समर्थन मोहम्मद रिज़वी जैसे आम मतदाता भी करते हुए दिखाई देते हैं. भागलपुर लोकसभा क्षेत्र के मतदाता रिजवी के अनुसार नीतीश सरकार ने अपने कार्यकाल में मुसलमानों की भलाई के लिए ऐसे कई काम किए जो अब तक की कोई सरकार नहीं कर पाई.

दूसरी ओर अरशद अजमल का भी मानना है कि सभी सीटों पर मुसलमान जदयू से एक समान दूरी बनाए नहीं रख रहे हैं. हाजीपुर, पूर्णिया जैसे सीटों की मिसाल देते हुए वे कहते हैं कि सूबे में ऐसी कुछ सीटें हैं जिन पर मुसलमानों ने यह पाया है कि जदयू ही एनडीए को हराने में ज्यादा समक्ष है.

लेकिन जानकार यह भी मानते हैं कि लोकसभा चुनावों से इतर भविष्य की राजनीति की बात करें तो जदयू के लिए संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. आम मतदाताओं के साथ-साथ कई मुस्लिम मतदाता भी यह दोहराते हैं कि वे विधानसभा चुनावों में जदयू का समर्थन करेंगे.

ऐसे में आने वाले दिनों में जदयू ने अगर राजनीतिक रूप से सही रणनीतियां अपनाईं तो नीतीश कुमार बिहार में मुसलमानों के बीच स्वीकार्य नेता बन सकते हैं.

नीतीश पटना रैली

इसकी वजहें बताते हुए राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं कि भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश की धर्मनिरपेक्ष छवि ज्यादा साफ हुई है और मुसलमान आधार धीमे-धीमे ही सही, उनकी ओर खिसक रहा है.

वह आगे कहते हैं कि नीतीश मुसलमानों की चिंताओं, राजनीतिक एजेंडे, सवालों को ज्यादा व्यापक संदर्भ में देखते-समझते हैं. नीतीश इस समुदाय के सामाजिक और आर्थिक न्याय से जुड़े सवालों को ज्यादा व्यापक तरीके से उठाते हैं.

अब देखना है कि 16 मई का दिन क्या उन आकलनों को सही साबित करता है जिसमें जदयू को मुसलमानों का ज्यादा समर्थन नहीं मिलने की बात कही जा रही है. साथ ही यह भी कि अगर ऐसा हुआ तो क्या इसके बाद भी जदयू मुसलमानों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा पाती है?

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