बीबीसी हैंगआउट: चुनाव को लेकर क्या है युवा कश्मीरियों की सोच?

- Author, मुकेश शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कश्मीर से
सड़क के किनारे पटरी पर बैठे दुकानदार ने अपने साथी की ओर देखते हुए चुहलभरी आवाज़ में कहा, ‘अबकी बार मोदी सरकार’. उस साथी ने भी कुछ वैसी ही मुस्कान में जवाब दिया, ‘हम तो अरविंद केजरीवाल वाले हैं.’
श्रीनगर में डल झील के सामने होटलों की भरमार है. सैलानी भी काफ़ी बड़ी तादाद में दिखते हैं. शायद ये बयान उन सैलानियों से एक ‘कनेक्ट’ साधने की कोशिश थी.
मगर मैंने उत्सुकता में उन दोनों दुकानदारों के बीच सवाल उछाल दिया- “अच्छा, अरविंद केजरीवाल का प्रत्याशी यहाँ कौन है?”
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जवाब ने मुझे झट से सच्चाई की ज़मीन पर ला खड़ा किया, “अरे कैसा प्रत्याशी, यहाँ वोट ही कहाँ देते हैं. सब बंद रहता है.”
सहमी प्रतिक्रियाएँ
देशभर में इस बात का शोर है कि बड़ी तादाद में लोग मतदान के लिए निकल रहे हैं मगर यहाँ कश्मीर में प्रतिक्रियाएँ सहमी सी ही हैं.
चुनाव की बात छेड़ने पर सभी तो नहीं मगर काफ़ी लोग असहज हो जाते हैं. दरअसल अलगाववादियों की ओर से चुनाव के बहिष्कार की घोषणा को देखते हुए लोग खुलकर कुछ नहीं कह पाते.

तो क्या कश्मीरी युवा भी यही सोच रखते हैं? उन्हें क्या लगता है- क्या कश्मीर की आवाज़ दिल्ली तक पहुँचती है?
<link type="page"><caption> गुजरात मॉडल क्या भारत के लिए मुनासिब है?</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=MqPQjjPcCys" platform="highweb"/></link>
इसी को टटोलने के लिए बीबीसी कैंपस हैंगआउट की टीम श्रीनगर से लगे बारामूला में एसएसएम कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलॉजी में है.
गूगल हैंगआउट
इस कॉलेज के युवा छात्र-छात्राओं के साथ ये बेहद रोचक परिचर्चा शनिवार को दोपहर एक बजे से दो बजे के बीच बीबीसी हिंदी के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित होगी.

इस हैंगआउट के ज़रिए कार्यक्रम में शामिल होने वाले छात्र-छात्राओं से ये समझने में मदद मिलेगी कि युवा कश्मीरियों के मुद्दे इस चुनाव में क्या हैं? अगर वे चुनाव में हिस्सा लेने का फ़ैसला करते हैं तो क्या ध्यान में रखकर मतदान करेंगे या अगर वे मतदान से अलग रहना चाहते हैं तो क्यों?
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