विवादों की मक्खियों के लिए गुड़ मतलब आज़म ख़ान

- Author, अतुल चंद्रा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
उत्तर प्रदेश विधानसभा के आठ बार सदस्य रह चुके आज़म खान राज्य में समाजवादी पार्टी के लिए अहम हैं और चाहे-अनचाहे विवादों में घिरते रहते हैं. इस चुनाव में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव से ज़्यादा आज़म ख़ान मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं.
एक तरफ उनके कुछ मातहत उन पर बदसलूकी और बदज़ुबानी का इल्ज़ाम लगा कर उनके साथ काम करने से मना कर देते हैं, दूसरी तरफ उनसे जुड़े भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी उनकी कार्यकुशलता और व्यवहार की तारीफ़ करते हैं.
एक ओर आज़म विशाल जनसमूह वाले कुम्भ का आयोजन कर धर्मनिरपेक्षता की मिसाल रखने का दावा करते हैं, वहीं उनके नफरत फैलाने वाले भाषण उनको मुश्किल में डाल देते हैं.
जब चुनाव आयोग ने उनको साम्प्रदायिक सौहार्द भंग करने वाले भाषण देने के आरोप में चुनाव प्रचार करने से रोक दिया तो आज़म खान चुप नहीं बैठे.
पहले तो आज़म ने आयोग पर आक्षेप लगाया कि वो कांग्रेस के कहने पर पक्षपात कर रहा है और फिर एक जनसभा में उन्होंने अपना भाषण किसी और से पढ़वा दिया.
नतीजा, चुनाव आयोग ने आज़म को एक और नोटिस भेज दिया.
विवादों के आदी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र नेता रहे आज़म खान के लिए यह पहला मौक़ा नहीं होगा जब उन्होंने कोई विवादास्पद बात कही हो.
कारगिल के युद्ध पर दिए गए भाषण और "कुत्ते के पिल्ले के बड़े भाई" वाले बयान से पहले आज़म भारत माता को डायन कहने के आरोप में घिर चुके हैं. उनकी भैंसों को ढूंढने में दिखाई गई पुलिस की मुस्तैदी और मुज़फ्फरनगर दंगों के तुरंत बाद विधायकों के दल को विदेश-भ्रमण पर ले जाने के लिए भी आज़म की तीखी आलोचना हुई थी.

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2010 में दिए गए एक बयान में आज़म ने केंद्रीय मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद को लेकर कहा कि वह कश्मीरी हैं, भारतीय नहीं. उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है बल्कि विवादास्पद है, उनके इस बयान पर भी काफ़ी हंगामा हुआ था.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर आज़म खान का ज़िक्र करने पर हँसते हुए कहते हैं, "आज़म साहब मुंहफट ज़रूर हैं लेकिन तेजस्वी हैं और एक प्रशंसनीय सांसद/विधायक हैं."
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रदीप माथुर आज़म के जूनियर थे और तभी से वह उन्हें जानते हैं.
आज़म ख़ान के जानने वाले कहते हैं कि ज़्यादातर सादे लिबास (कुर्ता, पाजामा और मौसम के हिसाब से शेरवानी) में दिखने वाले आज़म की ख़ासियत है उनकी ईमानदारी. ये कहते हैं कि आज़म के लम्बे राजनीतिक जीवन में किसी ने उनके चरित्र के ऊपर उंगली नहीं उठाई है.
बातचीत में यूँ तो वह सरल नज़र आते हैं और शेरो-शायरी के शौक़ीन हैं, विपक्ष उनकी वाकपटुता और शब्दों के बाण से कई बार निशाने पर रहा है.
भाजपा के नेता ह्रदय नारायण दीक्षित, जो प्रदेश में संसदीय कार्य मंत्री रह चुके हैं, वो कहते हैं, "आज़म साहब शिष्टाचार, आदर, प्रेम और व्यवहार में बहुत अच्छे हैं लेकिन वह संसदीय संस्थानों का सम्मान नहीं करते हैं. एक संसदीय कार्य मंत्री के रूप में भी आज़म ख़ान ने केवल विपक्ष को बोलने से रोका और सदन की मर्यादा की परवाह नहीं की. केवल विपक्ष को बोलने से रोकना ही संसदीय कार्य मंत्री की ज़िम्मेदारी नहीं होती है."

चुनौती आसान नहीं
उत्तर प्रदेश विधानसभा में यदि अच्छे वक्ताओं की बात होती है तो उनमें आज़म का नाम सबसे ऊपर आता है. उनका तंज़िया और विनोदपूर्ण अंदाज़ और उनकी हाज़िरजवाबी उन्हें विधानसभा में अन्य वक्ताओं से अलग करती है.
विधानसभा में आवाज़ को तेज़ किए बगैर आज़म एक सधे हुए अंदाज़ में बोलते हैं लेकिन राजनीतिक दृष्टि से उत्तेजक भाषण देते समय उनका तेवर बदल जाता है.
समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक, आज़म खान पार्टी का मुस्लिम चेहरा हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद आज़म ने पार्टी की संसदीय बोर्ड की सदस्यता और पार्टी के महासचिव पद से इसलिए इस्तीफा से दिया था क्योंकि वह मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह की नज़दीकियों से नाराज़ थे.

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2009 में मुलायम ने बाबरी मस्जिद के गिरने में अहम किरदार निभाने वाले कल्याण सिंह के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. समाजवादी पार्टी उस चुनाव में केवल 23 सीट जीत पाई थीं. आज़म ने इसका दोष मुलायम और कल्याण की दोस्ती को दिया और कहा कि मुसलमान इससे आहत थे.
क्षुब्ध मुलायम ने आज़म को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया. दिसंबर 2010 में एक भावुक समारोह में आज़म की पार्टी में वापसी हुई.
उस वक़्त यह कहा गया कि मुलायम ने आज़म को मनाने का फैसला 2012 के विधानसभा चुनाव को नज़र में रखते हुए लिया. मुलायम यादव को लगा कि 2009 में कम सीट मिलने की एक वजह तो कल्याण सिंह से उनकी दोस्ती थी और दूसरी आज़म की नाराज़गी.
आज़म ख़ान को समाजवादी पार्टी का मुस्लिम चेहरा माना जाता है लेकिन आल-इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन समिति के संयोजक जफ़रयाब जिलानी मुलायम को मुसलमानों का सबसे बड़ा नेता और हिमायती मानते हैं. आज़म का जो भी दबदबा है वह रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है, रामपुर से आठ बार चुनाव जीतने से ज़ाहिर है कि उस क्षेत्र में आज़म की पकड़ मज़बूत है.

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लेकिन समाजवादी पार्टी के कुछ अन्य मुसलमान नेता, जैसे शाहिद मंज़ूर, आज़म को मुसलमानों का बड़ा नेता नहीं मानते हैं.
रामपुर के नवाब खानदान की बेगम नूर बानो (कांग्रेस) के घोर विरोधी आज़म के बारे में वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ल कहते हैं कि उनकी भाषण देने की कला तो बढ़िया है लेकिन वो विववादास्पद बयान ज़्यादा देते हैं.
आज़म, मुलायम के प्रिय और करीबी नेताओं में गिने जाते हैं. लेकिन मुलायम की कोशिश रहती है कि आज़म को बहुत ताकतवर न होने दें.
ऐसे ही एक प्रयास में दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम बुखारी ने जब मुलायम यादव की मदद से उत्तर प्रदेश में अपने पाँव फैलाने शुरू किए तो आज़म ने मंडराते खतरे को तुरंत भांप लिया और बुखारी का जम कर विरोध किया. मुलायम को अंततः झुकना पड़ा.
कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के साढ़े चार मुख्यमंत्रियों में आज़म खान एक हैं और वह अगर सुनते हैं तो सिर्फ़ मुलायम की.
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