कैंपस हैंगआउट: क्या ‘गुजरात मॉडल’ में ही है देश का भविष्य?

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- Author, मुकेश शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से
चुनाव के इस गर्म माहौल में अक़सर ये आवाज़ सुनने को मिल रही है कि प्रधानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने गुजरात का जिस तरह विकास किया वैसा उनके सत्ता में आने के बाद पूरे देश का होगा.
विकास का नारा भाजपा की ओर से चुनाव मैनेज करने वालों ने कुछ यूँ गढ़ा है कि वो इस चुनाव का एक अहम मुद्दा बन गया है.
<link type="page"><caption> (कैंपस हैंगआउट इस लिंक पर उपलब्ध होगा) </caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=MqPQjjPcCys" platform="highweb"/></link>
मगर भाजपा के इन दावों को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे उनके विरोधी दल सिरे से खारिज करते रहे हैं. उनका कहना है कि विकास का ये ‘गुजरात मॉडल’ सबको साथ लेकर चलने वाला मॉडल नहीं है.
ऐसे में ख़ुद गुजरात का युवा इस मुद्दे पर क्या सोच रखता है? उनके मुताबिक़ क्या विकास का ये मॉडल वास्तव में पूरे देश पर लागू हो सकता है? यही जानने की मंशा से बीबीसी कैंपस हैंगआउट की टीम मौजूद है अहमदाबाद के गुजरात विद्यापीठ में.
गुजरात विद्यापीठ
गुजरात विद्यापीठ की स्थापना ख़ुद महात्मा गाँधी ने 1920 में की थी. विश्वविद्यालय के इस कैंपस में महात्मा गाँधी की एक छाप साफ़ महसूस होती है. विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार अपने कमरे में कुर्सी मेज़ पर नहीं बल्कि ज़मीन पर गद्दी पर बैठते हैं और उनके सामने मेहमान भी यूँ ही बैठाए जाते हैं.
रोज़ सुबह 11 बजे प्रार्थना के बाद लोग चरखे पर सूत कातते हैं. मगर ऐसा नहीं कि विश्वविद्यालय या उसके छात्र समय में कहीं रुक गए हैं. टेक्नॉलॉजी को अपनाकर आगे बढ़ने की कोशिश भी है.

इसी निराले कैंपस से शुक्रवार 18 अप्रैल को भारतीय समयानुसार दोपहर एक बजे से दो बजे तक आप बीबीसी हिंदी के यू-ट्यूब चैनल पर कैंपस हैंगआउट देख पाएँगे.
‘मोदी के गुजरात’ का मॉडल
इस हैंगआउट के ज़रिए हमारी ये समझने की कोशिश है कि जिस राज्य को विकास के एक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है ख़ुद वहाँ का युवा वर्ग इस मॉडल को लेकर कितना आश्वस्त है.
क्या इस मॉडल का मतलब उन्हें उद्योगों को प्राथमिकता देना और उस प्रक्रिया में ग़रीबों की अनदेखी करना लगता है या ग़रीबी पर सिर्फ़ बात न करके उन्हें विकास की प्रक्रिया के ज़रिए बेहतर हालात में पहुँचाने के नरेंद्र मोदी के दावे में दम है?
विकास को लेकर नरेंद्र मोदी की जिस कथित लहर की चर्चा मीडिया में इतने ज़ोर-शोर से हो रही है, उसकी सच्चाई क्या है? क्या यही एक उजली तस्वीर है या इसके दाग़ों को लीप-पोत कर शक़्ल बेहतर दिखाई जा रही है.
वैसे इस मुद्दे पर सिर्फ़ राजनीतिक दल ही नहीं <link type="page"><caption> अर्थशास्त्री</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/04/140413_gujarat_model_jean_dreze_election2014spl_vr.shtml" platform="highweb"/></link> भी भिड़ रहे हैं. कुछ को लगता है कि विकास की ये कथित कहानी सिर्फ़ एक मरीचिका है. तो वहीं कई ऐसे भी हैं जो इसके लिए नरेंद्र मोदी को ही श्रेय देना चाहते हैं
बीबीसी कैंपस हैंगआउट
ऐसे में देशभर में अगर इस मुद्दे पर बहस हो रही है तो शायद वह लाज़िमी भी है.
मगर इस कैंपस हैंगआउट के ज़रिए बीबीसी हिंदी इस मॉडल और उसकी ख़ूबियाँ या नाकामियाँ समझने की कोशिश कर रही है गुजरात विद्यापीठ के छात्र-छात्राओं से.
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