सासारामः बाबूजी के नाम के आसरे मीरा कुमार

सासाराम
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, सासाराम से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

सासाराम फिलहाल वाराणसी, लखनऊ, अमेठी जैसे लोकसभा क्षेत्रों की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में नहीं है.

लेकिन जब 16 मई को मतगणना होगी तब बिहार की इस लोकसभा सीट पर पूरे देश की नज़र रहेगी. पंद्रहवीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार यहां से सांसद हैं और एक बार फिर से चुनाव मैदान में भी हैं.

<italic><documentLink href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/04/100427_highway_shershah.shtml" document-type="video"> (शेरशाह सूरी का सासाराम)</documentLink></italic>

सासाराम लोक सभा क्षेत्र बिहार की उन छह सुरक्षित सीटों में से एक है जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है.

लंबे समय तक कांग्रेस का दलित चेहरा माने जाते रहे दिवंगत नेता जगजीवन राम ने सात बार सासाराम का लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया. उनकी बेटी और लोकसभा की निवर्तमान अध्यक्ष मीरा कुमार पिछले दो चुनावों से यहां का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.

मुक़ाबला

मीरा कुमार का चुनावी प्रचार

सासाराम शहर और आस-पास के गांवों में लोगों से बातचीत से जो राजनीतिक तस्वीर सामने आई उसमें मुख्य रूप से मुक़ाबला मीरा कुमार और भाजपा उम्मीदवार छेदी पासवान के बीच दिखाई दे रहा है. 2009 के चुनाव में भी मीरा कुमार ने भाजपा उम्मीदवार मुनि लाल को हराया था.

<italic><link type="page"><caption> (बिहार में मायावती का जादू)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140325_mayawati_bihar_politics_election_2014_spl_aa.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

राम सिंहासन प्रसाद पेशे से डाकिया हैं. हर मौसम घर-घर घूमते हैं. इलाक़े में चुनावी माहौल का बयान करते हुए उन्होंने कहा कि मुकाबला मीरा और मोदी के बीच ही है. साथ ही दोनों ही उम्मीदवारों की ज़मीनी स्थिति को इन दो नारों के ज़रिए भी समझा जा सकता है.

'जगजीवन की हीरा है, सासाराम की मीरा है', मीरा कुमार के प्रचार बैनरों में एक नारा यह भी दिखाई देता है. तो दूसरी ओर भाजपा को समर्थक यह जुमला सुनाना नहीं भूलते कि 'छेदी पासवान मजबूरी है, नरेंद्र मोदी ज़रूरी हैं.'

दरअसल आज मीरा कमार का क़द और राजनीतिक व्यक्तित्व देश-दुनिया में चाहे जितना ही बड़ा हो, क्षेत्र में आज भी वह अपने पिता की राजनीतिक विरासत के सहारे ही चुनाव लड़ती हैं.

'सशर्त' समर्थन

भाजपा का प्रचार अभियान

जैसा कि मोर गांव के हरिहर राम बताते हैं कि वे कांग्रेस के समर्थक हैं और मीरा कुमार को वोट देंगे. क्यों देंगे, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि यह क्षेत्र उनके (मीरा कुमार के) बाबूजी का है और उन्होंने विकास के कई काम किए थे.

<italic><link type="page"><caption> (बिहार में रेलवे प्लेटफॉर्म पर पढ़ाई)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/06/120620_station_students_da.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

वहीं दूसरी ओर छेदी पासवान का समर्थन क्षेत्र के लोग नरेंद्र मोदी के लहर के प्रभाव में कर रहे हैं. चुनाव के पहले दल बदलने की छवि रखने वाले छेदी पासवान ने ठीक चुनावों के पहले जदयू छोड़कर भाजपा का दामन थामा है.

छेदी पासवान को मिल रहे 'सशर्त' समर्थन के बारे में सराय गांव के जयराम पासवान बताते हैं कि छेदी अब-तक पांच-छह दल बदल चुके हैं, इस कारण वे मजबूरी हैं और नरेंद्र मोदी की पूरे देश में लहर है, इस कारण वे ज़रूरी हैं.

तीसरा कोण

सासाराम में चुनाव

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव बिहार में इस मायने में ख़ास हैं कि पहली बार सूबे में हर सीट पर त्रिकोणीय मुक़ाबला है. हर क्षेत्र में एनडीए, यूपीए और तीसरे मोर्चे के प्रत्याशियों की दमदार उपस्थिति दिखाई दे रही है. गौरतलब है कि बिहार में सत्तारुढ़ जदयू, भाकपा और माकपा तीसरे मोर्चे में शामिल हैं.

<italic><documentLink href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/03/100325_shershah_pack_ac.shtml" document-type="audio"> (स्वर्णिम चतुर्भुज और ग्रांड ट्रंक रोड)</documentLink></italic>

यहां से पूर्व आईएएस अधिकारी केपी रमय्या को जदयू ने अपना उम्मीदवार बनाया है. राज्य सरकार के कामकाज के नाम पर जदयू अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांग रही है. इनमें महादलित मिशन के तहत किए गए काम भी प्रमुख हैं.

गौरतलब है कि रमय्या नीतीश कुमार सरकार के महत्वाकांक्षी योजना महादलित मिशन को आकार देने वाले प्रमुख नौकरशाह माने जाते हैं. चुनावों के ठीक पहले उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी.

महादलित, अतिपिछड़ों के समर्थन के साथ-साथ नरेंद्र मोदी के विरोध में होने वाली गोलबंदी में अगर क्षेत्र की जनता ने जदयू की जीत की संभावना देखी तो सासाराम के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं.

बसपा का आधार

बसपा, मायावती

इमेज स्रोत, Reuters

सासाराम की बात करें तो यहां ऊपर के तीनों गठबंधन के अलावा बहुजन समाज पार्टी यानी की बसपा का भी अच्छा आधार है. उत्तर प्रदेश से सटे इस लोकसभा क्षेत्र में बसपा का अपना परंपरागत आधार वर्ग है.

<italic><link type="page"><caption> (हाशिये पर हैं 20 करोड़ दलित?)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140323_dalit_series_election_2014_spl_aa.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

2009 के आम-चुनाव में यहां बसपा उम्मीदवार गांधी आजाद को लगभग एक लाख मत मिले थे. लेकिन इस बार प्रत्याशियों को लेकर हुई उठापटक के कारण बसपा का दावा थोड़ा कमज़ोर दिखाई दे रहा है.

बसपा ने मीरा कुमार को कड़ी टक्कर देने के उद्देश्य से अंतिम समय में उनकी भतीजी मेधावी कीर्ति को अपना उम्मीदवार घोषित किया था. लेकिन जांच के दौरान उनका नामांकन त्रुटिपूर्ण पाया गया और वह मुक़ाबले से बाहर हो गईं.

गठबंधन

सासाराम में चुनाव

बिहार के तीनों बड़े गठबंधनों ने चुनाव के ठीक पहले आकार लिया है. इसके बावजूद सासाराम में यह ज़मीन पर भी सफल दिखा.

<italic><link type="page"><caption> (15 वीं लोकसभा की पाँच बातें)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140221_15th_loksabha_analysis_vr.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

कुसुढ़ी गांव के रामनाथ पासवान ने बताया कि 2009 में उन्होंने राजद गठबंधन को वोट दिया था लेकिन इस बार रामविलास पासवान की पार्टी का भाजपा से गठबंधन है तो वो भाजपा को वोट देंगे.

वहीं सासाराम से लगभग पांच कलोमीटर की दूरी पर बसे मुरादाबाद के इबरार अहमद ने बताया कि उन्होंने पिछले बार लालू यादव की पार्टी को वोट दिया था लेकिन इस बार लालू ने कांग्रेस से गठबंधन किया है तो इस बार वह मीरा कुमार को वोट देंगे.

नाराजगी

सासाराम में चुनाव

जगजीवन राम की छवि और दूसरे राजनीतिक समीकरणों के कारण मीरा कुमार को क्षेत्र के संपन्न वर्ग के लोगों का समर्थन अब तक मिलता रहा है. लेकिन यह तबका इस बार उनके प्रति नाराज़ दिखाई दे रहा है.

<italic><link type="page"><caption> ('रसातल में संसदीय मूल्य')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140214_indian_parliament_nadir_dil.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

पिछले साल सासाराम शहर से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर बसे बड्डी गांव में स्वतंत्रता दिवस के दिन झंडा फहराने को लेकर हुए विवाद में एक दलित की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हुए थे. घटना में मुख्यतः राजपूत जाति के लोग शामिल बताए जाते हैं.

घटना के बाद मीरा कुमार ने 'दबंग वर्ग' के लोगों की आलोचना की थी. इसके बाद से ही उनके प्रति क्षेत्र में ऊंची जातियों के बीच नाराज़गी है और चुनाव के बहाने वे अपनी नाराज़गी को प्रकट करने का मौका भी तलाश कर रहे हैं.

जीत और जवाब

सासाराम में चुनाव

दूसरी ओर क्षेत्र में पहाड़ उत्खनन पर लगी रोक भी एक मुद्दा है. जिस वक़्त रोक लगी थी, जदयू उम्मीदवार राज्य के खनन सचिव थे. क्षेत्र में लगभग 40,000 परिवारों की आजीविका इस कारोबार से चलती है. ऐसे में इस काम में लगे मज़दूरों को जदयू के खिलाफ भड़काया भी जा रहा है.

<italic><link type="page"><caption> (महिलाएँ टिकट पाने में पीछे)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/04/140401_women_voters_election2014spl_ap.shtml" platform="highweb"/></link></italic>

साल 1986 में जगजीवन राम की मौत के बाद भी मीरा कुमार ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए 1989 के आम चुनाव में सासाराम से चुनाव लड़ा था. लेकिन लगातार 1989 और 1991 के आम चुनावों में उन्हें छेदी पासवान के हाथों हार का सामना करना पड़ा था.

एक बार फिर इस क्षेत्र में यही दोनों उम्मीदवार मुख्य मुक़ाबले में दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मीरा अपनी सीट बरकरार रखते हुए दो दशक पहले की दो हारों का हिसाब-किताब बराबर कर पाएंगी.

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