'चुनाव आयोग इंटरनेट को नहीं समझता'

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- Author, अनुराग शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
फ़रवरी 2014 में पाकिस्तानी अख़बार डॉन की वेबसाइट पर छपे एक कथित विज्ञापन ने भारत में ट्विटर पर काफ़ी हलचल पैदा की थी. इसमें नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह की तस्वीर के बगल में देवनागरी में लिखा था "भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए योगदान दें".
एक पाकिस्तानी अख़बार की वेबसाइट पर आए इस विज्ञापन को मोदी विरोधियों ने हाथों हाथ लिया था. जबकि भाजपा ने इस तरह के किसी भी विज्ञापन से इनकार किया है.
हालांकि तब चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं हुई थी लेकिन इस तरह के विज्ञापन को लेकर विवाद से ये सवाल ज़रूर उठता है कि इंटरनेट पर राजनीतिक सामग्री पर किसका नियंत्रण है. भारत का चुनाव आयोग ये चाहता है कि राजनीतिक दल कोई भी विज्ञापन इंटरनेट पर डालने से पहले उसे दिखाए.
चुनाव आयोग ने 18 मार्च को एक सर्कुलर जारी कर पार्टियों से कहा है कि वो कोई भी विज्ञापन पोस्ट करने से पहले उसे एक कमेटी से मंज़ूर कराएं. साथ ही आयोग ने उम्मीदवारों से उनके सोशल मीडिया अकाउंट और ईमेल अकाउंट की भी जानकारी मांगी है.
चुनाव आयोग ने अपने सर्कुलर में कहा है, "पहले से जांच के बिना कोई भी राजनीतिक विज्ञापन न तो इंटरनेट और न ही इंटरनेट आधारित मीडिया पर दिखाया जाएगा. इंटरनेट आधारित मीडिया इस बात की सक्रिय जांच करेगा और तय करेगा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान जो सामग्री वो दिखाएं वो किसी भी तरह से ग़ैरक़ानूनी या आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली न हो."
'सेंसरशिप नहीं हो'
भाजपा की आईटी सेल के अध्यक्ष अरविंद गुप्ता का कहना है कि चुनाव आयोग के इस ताज़ा सर्कुलर में कुछ भी नया नहीं है. हालांकि वो इस क़दम का स्वागत करते हैं लेकिन ये भी कहते हैं कि ऑथराइज़ेशन के नाम पर किसी तरह की सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए.
कांग्रेस पार्टी की ओर से इस ख़बर पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने के लिए कोई प्रवक्ता उपलब्ध नहीं हुआ. लेकिन कांग्रेस के एक स्वयंसेवक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वो मानते हैं कि यह आदेश व्यावहारिक नहीं है.
"हम चुनाव आयोग का सम्मान करते हैं लेकिन एक बात कहना चाहते हैं, हम विज्ञापन को तो अप्रूव करा सकते हैं लेकिन हर चीज़ की इजाज़त नहीं ले सकते. अगर हमें किसी विज्ञापन को दो घंटे में एयर करना है तो क्या चुनाव आयोग के पास इस तरह की क्षमता है कि वो दो घंटे में इसकी इजाज़त दे दे."

हालांकि चुनाव आयोग के निर्देश को कुछ जानकार सही नहीं मानते. उनका कहना है कि चुनाव आयोग का ये प्रस्ताव पूरी तरह से अव्यावहारिक है और इससे लगता है कि उसे ये नहीं पता कि इंटरनेट कैसे काम करता है.
'व्यावहारिक नहीं'
डिजिटल मीडिया की समीक्षा करने वाली वेबसाइट मीडियानामा के संपादक निखिल पाहवा कहते हैं, "ये कदम व्यावहारिक तो है नहीं, क्योंकि इंटरनेट पर जो विज्ञापन होते हैं उस पर वेबसाइट का कोई कंट्रोल नहीं होता. किसी भी समय हज़ारों विज्ञापन होते हैं जिनमें से कोई भी चल सकता है. हज़ारों विज्ञापन को मॉनीटर करना वेबसाइट के लिए संभव नहीं है क्योंकि विज्ञापन वो नहीं, गूगल दे रहा है. और दुनिया में करोड़ों विज्ञापन चलते हैं. गूगल का भी इन पर नियंत्रण नहीं होता."
दिलचस्प बात ये है कि चुनाव आयोग का आदेश राजनीतिक दलों पर लगाम कसने की तो बात करता है लेकिन सोशल मीडिया पर काम कर रहे स्वयंसेवकों को लेकर स्पष्ट नहीं है.
चुनाव आयोग ने इस बारे में कहा है कि वो सूचना और प्रसारण मंत्रालय से बात कर रहा है.
तकनीकी जानकार प्रशांतो रॉय मानते हैं कि भारत में राजनीतिक सामग्री पर नियंत्रण की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है और चुनाव आयोग के लिए भी ये आसान नहीं है.

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'चुनाव आयोग की मुश्किल'
प्रशांतो रॉय कहते हैं, "हालांकि आईटी एक्ट से कुछ ढांचा बना है जिसका लोग सहारा ले सकते हैं लेकिन कोई एक ठोस व्यवस्था नहीं है. पार्टियों के कार्यकर्ता तरह-तरह की बातें करते हैं और पार्टियों के लिए इनके द्वारा कही गई बातों को नकारना बहुत आसान है. इसलिए चुनाव आयोग के लिए ये पूरी व्यवस्था बहुत मुश्किल हो गई है."
निखिल पाहवा कहते हैं, "जहां तक दलों की बात है या उम्मीदवारों की बात है वहां तक चुनाव आयोग के लिए ठीक है. आप वेबसाइट पर कैसे नियंत्रण करेंगे कि वो कौन सा विज्ञापन दिखाएं और कौन सा नहीं जबकि कई बार वो खुद उनके नियंत्रण में नहीं होता. कितनी ही वेबसाइट हैं जो भारत की क़ानूनी सीमा में नहीं आतीं."
वो आगे बताते हैं, "मैं एक उदाहरण देता हूं, गार्डियन या न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट पर अगर कोई एड नेटवर्क लगा है तो कोई भी आदमी उस पर राजनीतिक विज्ञापन चला सकता है. भारत से जो लोग देखेंगे सिर्फ़ वही उसे देख पाएंगे. इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है. इंटरनेट पर ये सीमाएं नहीं हैं इसलिए वहां मनमर्ज़ी नहीं कर सकते."
ज़ाहिर है कि विशाल इंटरनेट और बड़ी तादाद में इसका इस्तेमाल करने वालों की वजह से चुनाव आयोग के निर्देश बेमानी से नज़र आते हैं.
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