भाजपा, बदलाव और मोदी-लहर

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

ऐसा कहा जा रहा है कि देश में 'मोदी लहर' है लेकिन अगर ऐसा है तो क्या ख़ुद भारतीय जनता पार्टी में इस लहर का असर दिखाई दे रहा है? इस सवाल का जवाब हाँ और ना दोनों में हो सकता है.

अगर इन दिनों पार्टी में जारी आपसी मतभेद पर नज़र डालें तो शायद आप नतीजा ये निकालेंगे कि मोदी की लहर ख़ुद पार्टी के अंदर काम नहीं कर रही है. मगर जिस तरह से पिछले तीन-चार महीनों में नरेंद्र मोदी पार्टी में सत्ता के पायदान पर तेज़ी से चढ़े हैं और दूसरे नेता इस पायदान से नीचे गिरे हैं उसे देख कर आप कहेंगे पार्टी में केवल मोदी की ही लहर है.

जसवंत सिंह हों या लाल कृष्ण आडवाणी या फिर मुरली मनोहर जोशी ऐसा लगता है सालों से जमे इन वरिष्ठ नेताओं के पार्टी में दिन पूरे हो गए हैं.

ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता कि जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी की पार्टी में पकड़ मज़बूत होती जा रही है वैसे-वैसे इन नेताओं की पार्टी पर गिरफ़्त कमज़ोर होती जा रही है.

ये भी महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता कि इन सभी नेताओं को किसी न किसी कारण नरेंद्र मोदी से शिकायत है. जसवंत सिंह ने तो मोदी पर सीधा आक्रमण भी किया है. उन्हें बाड़मेर से टिकट न दिए जाने के पार्टी के फ़ैसले पर सुषमा स्वराज ने भी नाराज़गी जताई.

दूसरी तरफ़ बचे खुचे बड़े नेता जिन में राजनाथ सिंह और अरुण जेटली शामिल हैं नरेंद्र मोदी का नेतृत्व क़बूल कर चुके हैं. वो हर क़दम पर मोदी के साथ हैं और उनका समर्थन कर रहे हैं.

भाजपा के अधिकतर वरिष्ठ नेता दिल्ली में रहते हैं. उनके लिए नरेंद्र मोदी एक 'आउटसाइडर' थे. यहाँ तक कि अरुण जेटली भी शुरू में नरेंद्र मोदी के ख़ेमे में नहीं थे. लेकिन मोदी के आम चुनाव में प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित होते ही सत्ता समीकरण में बदलाव नज़र आने लगा.

इसके बाद मोदी तेज़ी से आगे बढे. पुराने नेताओं की आवाज़ें कम से कम सुनाई देने लगीं. आडवाणी ने इस बदलाव को रोकने की अथक कोशिश की लेकिन उन्हें भी ख़ामोशी अख़्तियार करनी पड़ी.

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नरेंद्र मोदी की लहर का असर पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं पर दिखाई नहीं देता लेकिन अगर युवा नेताओं और आम कार्यकर्ताओं से बातें करें तो वो केवल मोदी का ही नाम ले रहे हैं. उनके अंदर जो एक नया जोश दिख रहा है उसका कारण पार्टी के अंदर मोदी लहर का असर है. ऐसा लगता है मोदी की लहर ने पार्टी की शाखाओं को एक नया जीवनदान दिया.

अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी के कर्ता धर्ता पार्टी में नई जान फूंकना चाहते हैं तो शायद पुराने नेताओं को किनारे करना ग़लत नहीं माना जाएगा.

भाजपा पूरे दस साल से सत्ता से बाहर रही जिसके दौरान ये दो आम चुनाव हार चुकी है. पार्टी इस पूरे अर्से में विपक्ष की भूमिका ठीक तरीक़े से निभाने में नाकाम रही है और अगर इसे आगामी आम चुनाव जीतना है तो पार्टी को नए सिरे से संवारना ज़रूरी है.

कांग्रेस में बदलाव की ज़रुरत

इसकी ज़रुरत कांग्रेस पार्टी को भी है. मणि शंकर अय्यर का कहना है कि कोंग्रेस में 2009 चुनाव के पहले से ही परिवर्तन की ज़रुरत महसूस की जा रही थी लेकिन चुनाव में जीत के बाद इसे त्याग दिया गया. शायद 2014 के चुनाव के नतीजों के बाद पार्टी को अपने अंदर भारी बदलाव लाने की ज़रुरत पड़े. इस तरह का काम पहले भी हो चुका है.

राजीव गांधी ने एक साथ कई युवा नेताओं को पार्टी में प्रमुख स्थान दिए थे. लाल कृष्ण आडवाणी ख़ुद अधिक उम्र के थे लेकिन उन्हों ने भी युवा नेताओं को आगे बढ़ाया था.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा में परिवर्तन की ज़रुरत थी और अब जबकि ये हो रहा है इसका स्वागत भी किया जा रहा है लेकिन वो भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पुराने नेताओं को अलग करने का तरीक़ा सहीं नहीं है और ये कि ये चुनाव से काफ़ी पहले करना चाहिए था.

लेकिन इस परिवर्तन के समर्थन करने वालों के अनुसार परिवर्तन प्रकृति का नियम है. परिवर्तन एक ज़िंदा पार्टी की पहचान है.

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