कश्मीर में इस बार सियासी समीकरण बदलेंगे?

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- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत के दूसरे हिस्सों की तरह ही जम्मू और कश्मीर में भी चुनावी तैयारियों की सरगर्मियाँ देखी जा सकती हैं.
लेकिन चुनावी तौर-तरीक़ों के लिहाज़ से कश्मीर भारत के दूसरों हिस्सों से बहुत अलग है. हालांकि जम्मू और लद्दाख के इलाकों में मोटे तौर पर देशभर के मिजाज़ के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी पर चुनावी बहस-मुबाहिसों का दौर जारी है पर कश्मीर घाटी की अपनी चुनावी दुनिया है.
<link type="page"><caption> (दावों और वादों पर टिकी राजनीति)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140318_promise_claims_ground_reality_pk.shtml" platform="highweb"/></link>
यहाँ दो प्रमुख सियासी धड़े जिन्हें मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और अलगाववादी संगठनों में बांटा जाता है, एक दूसरे के ख़िलाफ़ विरोध का मोर्चा खोले हैं. मुख्यधारा की सियासी जमातों में वो दल हैं, जो कश्मीर के भारत में विलय का समर्थन करते हैं और पृथकतावादी राजनीतिक पार्टियां इसकी मुख़ालफ़त करती हैं.
जहाँ तक आम चुनाव की बात है, मुख्यधारा के राजनीतिक दल न केवल आपस में प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं बल्कि अलगाववादियों का मुक़ाबला वे एकजुट होकर कर रहे हैं.
बहिष्कार

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हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का कट्टरपंथी सैयद अली गिलानी की हिमायत वाला धड़ा, हुर्रियत के ही नरमपंथी धड़े के नेता मीरवाइज़ उमर फारूक़, जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ़) के यासीन मलिक और जम्मू कश्मीर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के शब्बीर शाह, ये सभी लोकसभा चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं.
<link type="page"><caption> (शक के घेरे में कश्मीरी?)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140310_kashmir_sedition_ia.shtml" platform="highweb"/></link>
लेकिन मुख्यधारा की सियासी जमातें आवाम को ये समझाने में मसरूफ़ हैं कि उन्हें वोट डालने के लिए घर से बाहर निकलना चाहिए. मुमकिन है कि बहिष्कार की अपीलों का घाटी में बहुत ज़्यादा असर न हो, पर यह भी सच है कि अलगाववादी पूरे ज़ोर-शोर से अपना अभियान चला रहे हैं.
और मुख्यधारा की सियासी जमातों पर इसका असर यह पड़ा है कि वे पहले की तरह बिजली, सड़क और पानी जैसे मुद्दों से अपना रुख मोड़कर कश्मीर की बात उठाने लगी हैं. जम्मू और कश्मीर की प्रमुख विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने कुछ ही दिन पहले अपना घोषणापत्र जारी किया है.
पीडीपी के मुखिया और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने मीडिया से कहा है कि अगर उनकी पार्टी के उम्मीदवार निर्वाचित होते हैं, तो वे कश्मीर के मुद्दे पर बात करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलवाएंगी.
'नरम अलगाववाद'

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कश्मीर प्रस्ताव, आर्म्ड फ़ोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (अफ्स्पा) और मानवाधिकार के मुद्दे उठाकर पीडीपी 'नरम अलगाववाद' की ओर रुख करती दिख रही है.
<link type="page"><caption> (दस मिनट में पैकिंग करो...)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140306_sediton_charge_dropped_fma.shtml" platform="highweb"/></link>
पार्टी लोगों को यह समझाने में जुटी है कि अलगाववादी जो चुनाव बहिष्कार के ज़रिए हासिल करना चाहते हैं, वह पीडीपी लोकतांत्रिक तरीक़े से हासिल करेगी और इसके लिए लोगों को मतदान के दिन बाहर आकर उसके उम्मीदवारों को चुनना होगा.
सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस भी इस दौड़ में पीछे नहीं दिख रही. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बार-बार कश्मीर से जुड़े राजनीतिक मसले पर भारत-पाकिस्तान की बातचीत की पैरवी की है.
मुख्यमंत्री ने हाल के दिनों में हज़ारों बार ये दोहराया होगा कि कश्मीर के सामने केवल अर्थव्यवस्था, नौकरी और विकास का मसला नहीं बल्कि इसे ऐसे बड़े सियासी मुद्दे से रूबरू होना पड़ रहा है, जिस पर भारत और पाकिस्तान को गंभीर बातचीत करनी है.
'चैन से नहीं बैठेंगे'

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उमर अब्दुल्ला अफ्स्पा को हटाने की बात कर रहे हैं और लोगों को समझा रहे हैं कि क़ानून ख़त्म होने तक वे 'चैन से नहीं बैठेंगे.' कश्मीर घाटी की तीनों लोकसभा सीटों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बीच सीधा मुक़ाबला है और एनसी को कांग्रेस का समर्थन हासिल है.
<link type="page"><caption> (प्रदर्शन के बाद कर्फ़्यू)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140225_kashmir_curfew_army_operation_sk.shtml" platform="highweb"/></link>
हालांकि बारामूला निर्वाचन क्षेत्र एक अपवाद है, जहाँ सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस तेज़ी से अपनी पैठ बना रही है और लोगों को चौंकाने का माद्दा रखती है.
ऐसे हालात में जबकि सभी पार्टियाँ अलगाववादियों के अभियान को लेकर फ़िक्रमंद हैं, वे उन्हीं (अलगाववादियों) की ज़ुबान में चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी के लिए लोगों को समझाने की कोशिश में हैं.
चुनाव प्रचार का एक और दिलचस्प पहलू यह भी है कि एक ओर जहाँ पीडीपी ने 'नरम अलगाववाद' का रवैया अख्तियार कर रखा है, वहीं दूसरी तरफ़ उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर डोरे डालने भी शुरू कर दिए हैं.
पीडीपी-बीजेपी

पीडीपी का घोषणापत्र जारी करते वक़्त मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार की तारीफ़ की और कहा कि उनकी सरकार एकमात्र सरकार थी, जिसने कश्मीर मुद्दे को तवज्जो दी और मसले के हल की प्रक्रिया शुरू की.
<link type="page"><caption> (अमन सेतु से कारोबार)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140221_deadlock_loc_trade_pk.shtml" platform="highweb"/></link>
मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने इस पर अफसोस जताया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की कोई कश्मीर नीति नहीं थी. इससे इसके भी संकेत मिलते हैं कि ऐसी सूरत में जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस यूपीए का औपचारिक तौर पर एक हिस्सा है, पीडीपी को एनडीए में शामिल होने पर शायद कोई ऐतराज़ न हो.
पीडीपी की नज़र राज्य विधानसभा चुनावों पर भी है जो इस साल के आखिर में होने हैं.
अगर एनडीए दिल्ली में हुक़ूमत में आती है तो जम्मू पर उसका कुछ असर होगा, जहाँ भाजपा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है और अगर घाटी में पीडीपी को ठीक सीटें मिलीं, तो जम्मू और कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी के गठबंधन वाली सरकार के गठन की सूरत बन सकती है.
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