'पढ़ने के अधिकार ने छुड़ाई जिनकी पढ़ाई'

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- Author, एलिस फ्रांसिस
- पदनाम, दिल्ली
दिल्ली में श्रमिकों की एक अवैध कॉलोनी में छह साल का एक बच्चा अंग्रेज़ी पढ़ रहा है. यानी वो भाषा जिसके बारे में उसके अभिभावकों को लगता है कि इसकी पढ़ाई से उसे कॉल सेंटरों या आफिसों में नौकरी मिल सकेगी.
लेकिन इस महीने के आख़िर में ये कक्षाएं रुक जाएंगी.
रामदीती जेआरएन दीपालय उन सैकड़ों छोटे प्राइवेटस्कूलोंमें है, जो हर बच्चे से हर महीने सौ रुपए शुल्क लेते हैं लेकिन अब ये सब बंद हो जाएंगे, क्योंकि ये बच्चों के 'शिक्षा के अधिकार' के क़ानून के मानकों पर खरे नहीं उतरते.
बच्चों की टीचर गीतांजलि कृष्णन कहती हैं, ''क़ानून के मानकों को पूरा करने वाले पंचशील एनक्लेव स्कूल तिगुनी फ़ीस लेंगे.''
वह कहती हैं, ''हमारे अभिभावक बहुत ग़रीब हैं, वे श्रमिक और प्रवासी मज़दूर हैं, वो शायद इसे वहन नहीं कर पाएं.''
जब शिक्षा का अधिकार क़ानून साल 2009 में लाया गया, तो तारीफ़ की गई कि ये देश में अमीरों और ग़रीबों के बीच शिक्षा की दूरी को पाटने का काम करेगा.
मानवाधिकार
क़ानून के अनुसार शिक्षा उस मानवाधिकार की तरह है जो छह से 14 साल तक के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य तौर पर मिलनी चाहिए.
ये क़ानून कहता है कि स्कूलों के पास पर्याप्त बुनियादी संरचना होनी चाहिए मसलन खेल का मैदान और लड़कियों के लिए टॉयलेट्स.
हालांकि आलोचक अब कह रहे हैं कि ये क़ानून उन लोगों पर आघात है, जिन्हें इसके जरिए मदद मिलनी चाहिए थी. इसकी गाज आमतौर पर झोपड़पट्टी और ग़रीब इलाकों के प्राइवेट स्कूलों पर पड़ रही है.
इन स्कूलों को बंद किए जाने पर बाध्य होना पड़ रहा है, क्योंकि उनके पास न तो पर्याप्त जगह है और न इतना धन कि मानकों के तहत सुविधाएं जुटा सकें.
'शिक्षा का अधिकार' क़ानून के पालन की सीमावधि 31 मार्च 2013 को बीत चुकी है, कई राज्य मानकों को पूरा नहीं करने वाले प्राइवेट स्कूलों को बंद करने का आदेश दे चुके हैं, इन स्कूलों के बहुत से बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला ले चुके हैं.
पंजाब के अधिकारी कहते हैं कि उन्होंने 1170 स्कूल बंद करा दिए. हरियाणा में 713 जबकि तमिलनाडु में 400 से कुछ ज़्यादास्कूल बंद किए गए. वहीं आंध्र प्रदेश में ये संख्या 400 से ज़्यादानहीं है.
बंद होने वाले स्कूलों का पूरा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है क्योंकि कुछ राज्यों ने इस क़ानून में ढील दी हुई है.
थिंक टैंक 'इंडिया इंस्टीट्यूट' के निदेशक बलदेव रंगाराजू मीडिया में संबंधित रिपोर्ट देखते रहे हैं. वे बताते हैं कि 2692 स्कूल बंद हो चुके हैं और 17,871 के सामने बंदी का संकट मंडरा रहा है.
वह कहते हैं, ''जिन राज्यों में स्कूलों के बंद होने का खतरा मंडरा रहा है, उनमें कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली शामिल हैं.''
इस क़ानून के आलोचक कहते हैं कि बेशक बहुत प्राइवेट स्कूल मानकों पर खरे नहीं उतरते हों लेकिन वो कहीं ज़्यादाबेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्र दे रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के टीचरों के बारे में माना जाता है कि वो क्लास में ही नहीं आते और उनमें ज्यादातर अंग्रेज़ी की पढ़ाई में दक्ष नहीं हैं.

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ग्रामीण क्षेत्रों में किए गए सर्वे के अनुसार प्राइवेट स्कूलों के छात्र पढ़ाई और गणित में सरकारी स्कूलों के बच्चों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हैं.
शिक्षा की स्थिति के सालाना सर्वे (एनुअल सर्वे ऑफ एजुकेशन यानि एएसईआर) के मुताबिक प्राइवेट स्कूलों में वर्ष 2006 के 19 फ़ीसदी की तुलना में वर्ष 2013 में दाखिले बढ़कर 29 फ़ीसदी हो गए.
दिक़्क़तें
पंजाब की अतिरिक्त राज्य परियोजना निदेशक परमपाल कौर कहती हैं, ''ये हमारी ड्यूटी है कि उन स्कूलों को बंद करें जो बेहतर सुविधाएं मुहैया नहीं करा रहे हैं. कुछ में टॉयलेट और पेयजल की सुविधा नहीं है.''
हरियाणा की शिक्षा मंत्री गीता बुक्कल कहती हैं, ''राज्यों ने केंद्र सरकार ने इस बारे में मार्गदर्शन के लिए कहा है.''
वह कहती हैं, ''हम समस्याओं का सामना कर रहे हैं क्योंकि ज्यादातर प्राइवेट स्कूल ऐसे हैं जो शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत मानकों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं. समस्या ये है कि हम उन्हें बंद करें या नहीं.''
बुक्कल ने कहा, ''इस साल मार्च के बाद हरियाणा में 1379 स्कूल बंद हो जाएंगे.''
आंध्र प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा मंत्री डॉक्टर साके सैलजानाथ ने कहा कि राज्य ने उन स्कूलों को बंद करा दिया जहां दस या कम छात्र थे. अब आगे 800 और स्कूलों को बंद किया जाएगा.
वे कहते हैं, ''ये स्कूल प्राइवेट कंपनियों की तरह हैं. सरकारी स्कूलों में हम बच्चों को मुफ्त किताबें और यूनिफार्म देते हैं.''
तमिलनाडु की अधिकारी पूजा कुलकर्णी कहती हैं,'' प्राइवेट स्कूलों में गुणवत्ता की कोई गारंटी नही है.''
वह कहती हैं, ''हम केवल दक्ष शिक्षकों को नौकरी देते हैं जबकि ग़ैर-मान्यता प्राप्त स्कूलोंमें हम नहीं जानते कि किस तरह के शिक्षकों को नौकरी पर रखा जाता है.''
कुलकर्णी कहती हैं कि इस साल 300 स्कूल बंद करा दिए जाएंगे.
प्रदर्शन

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हालांकि आलोचकों का कहना है कि 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून सरकारी शिक्षा के साथ मुख्य समस्या को समझने में नाकाम रहा है
रंगाराजू कहते हैं, ''इस क़ानून में ऐसा कुछ उल्लेख नहीं किया गया जो शिक्षकों के लिए शिक्षा देना सुनिश्चित करे, उनके वेतन को प्रदर्शन के साथ नहीं जोड़ा गया है और बच्चों के परीक्षण भी पर ज़ोर नहीं दिया गया.''
भारत के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ चुके यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकैसल के प्रोफेसर जेम्स टोली कहते हैं, ''सरकार को उन्हें बंद करने की बजाए उनके सुधार की कोशिश करनी चाहिए.''
उन्होंने कहा, ''आप अभिभावकों से धैर्य रखने और सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधरने का इंतज़ार करने के लिए नहीं कह सकते. सभी सरकारी अधिकारी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने भेज रहे हैं.''
कुछ भारतीय राज्य इस मामले में ज़्यादा नरम हैं, मसलन गुजरात, जहां स्कूलों के आकलन के मानक तय किए गए हैं. गुजरात में स्कूलों के मूल्यांकन में 70 फ़ीसदी छात्रों के प्रदर्शन को दिया गया है और 15 फ़ीसदी स्कूल की आधारभूत संरचना और शिक्षकों की योग्यता को.
दिल्ली ने स्कूलों की न्यूनतम भूमि आवश्यकता को पिछले साल आसान किया है लेकिन दिल्ली राज्य पब्लिक स्कूल्स मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष आरसी जैन कहते हैं, ''अभी 300 स्कूल बंद होने हैं और 750 बंद हो चुके हैं.''
रामदीती स्कूल ने पिछले साल छठी से आठवीं क्लास तक की पढ़ाई रोककर करीब 270 छात्रों को विदा कर दिया.
इन्हीं में एक छात्रा 11 वर्षीय संगीता पिल्लै हैं, जो अब सरकारी स्कूल में दाखिला ले चुकी हैं.
संगीता की मां कहती हैं कि उनकी बेटी की शिकायत है कि सरकारी स्कूल में टीचर उसके काम को जांचते नहीं और अक्सर जमीन पर बैठना पड़ता है.
उनका कहना है कि कुछ क्लासों में तो सौ बच्चे तक हैं.
(एलिस फ्रांसिस दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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