कितनी अहम है चुनाव में जातीय पहचान?

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, मुज़फ़्फ़रपुर से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
'जाति है कि जाती ही नहीं', भारत के सामाजिक परिदृश्य के संबंध में अक्सर यह टिप्पणी की जाती है. यहां व्यक्तिगत से लेकर राजनीतिक संबंधों तक को जोड़ने में जातीय पृष्ठभूमि ख़ास मायने रखती है.
ख़ासकर चुनाव नजदीक आते ही नेताओं और दलों की जातीय पहचान और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है. इसका उदाहरण एक बार फिर तीन मार्च को बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में भाजपा की हुंकार रैली में देखने को मिला.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष, मज़बूत नेता, ग़रीब का बेटा बताता रहा है. लेकिन सोमवार की रैली में उनकी एक और पहचान बार-बार मंच से दूसरे नेताओं ने बताई. चौंकाने वाली बात यह रही कि ख़ुद मोदी ने भी इसे दोहराया.
पिछड़े वर्ग का उम्मीदवार
सूबे और इससे बाहर पिछड़ी जातियों के वोट की अहमियत को देखते हुए उन्होंने कहा कि जो विरोधी भाजपा को बनिया-ब्राह्मण की पार्टी बताते थे, आज एक पिछड़े को प्रधानमंत्रीपद का उम्मीदवार बनाए जाने से चौंक गए हैं.
चुनाव के दौरान जातीय पहचान की इस अहमियत को रामजी सिंह की बातों से भी समझा जा सकता है. मुज़फ़्फ़रपुर जिले के हरपुर गांव के रामजी ने हुंकार रैली के बाद बातचीत में कहा कि वे भाजपा के कट्टर समर्थक हैं.
लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर इस बार मुज़फ़्फ़रपुर संसदीय क्षेत्र से उनकी जाति के नेता को भाजपा का टिकट नहीं मिला तो वह भाजपा को वोट नहीं देंगे.
भाजपा को मिला 'राम'

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ऐसे में चुनाव के दौरान अपने-अपने जाति के वोटों पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं की पूछ भी बढ़ जाती है. लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान ऐसे ही एक नेता माने जाते हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए एनडीए छोड़ने वाले रामविलास की गठबंधन में वापसी कई कारणों से भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है.
दलित मतदाताओं खासकर पासवान जाति से आने वाले मतदाताओं पर उनकी मजूबत पकड़ को इसका मुख्य कारण बताया जाता है. बिहार के कुल मतदाताओं में पासवान जाति के मतदाताओं की कुल संख्या पांच-छह फ़ीसदी बताई जाति है.
पासवान फरवरी के अंत में बारह साल बाद यूपीए से वापस एनडीए का हिस्सा बने.
रैली में आए दलित समुदाय के लोगों से बातचीत कर बीबीसी ने यह जानना चाहा कि वे इस वापसी के बारे में क्या सोचते हैं? रामविलास पासवान की पार्टी के इस फैसले से क्या उनके समुदाय की बेहतरी के रास्ते खुलेंगे?
विकास की उम्मीद

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मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के हरपुर गांव से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी मोटरसाइकिल से तय कर राकेश पासवान हुंकार रैली में आए थे.
राकेश के मुताबिक़ लालू प्रसाद यादव रामविलास पासवान को उचित सम्मान नहीं दे रहे थे. उनको लगता था कि वे सिर्फ अपने बूते जीत रहे हैं, रामविलास के पास कोई वोट ही नहीं है. ऐसे में रामविलास पासवान ने राजद से रिश्ता तोड़कर सही फ़ैसला किया है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि रामविलास पासवान चुनाव जीत कर मंत्री बनेंगे तो पासवान समुदाय को भी महादलित का दर्जा मिलेगा. इससे समुदाय को भी सरकारी योजनाओं का ज्यादा लाभ मिलेगा.
हुंकार रैली स्थल के पास स्थित पटियासा गांव के महादेव पासवान भी नेताओं को देखने-सुनने आए थे.
अपने घर के बाहर बातचीत में उन्होंने कहा कि जब जेल जाने के कारण लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था तभी उन्हें रामविलास पासवान को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था. इसके बाद भी लालू ने कभी उन्हें उचित मान-सम्मान नहीं दिया. ऐसे में रामविलास ने 'फूल छाप' के साथ जाने का सही फैसला लिया है.
समुदाय की भलाई

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राकेश की तरह महादेव पासवान ने भी उम्मीद जताई कि रामविलास जब जीतकर सरकार बनाएंगे तो उनके समुदाय का भला करेंगे, विकास करेंगे.
मुज़फ़्फ़रपुर जिले के रामपुर गांव की गीता देवी अपने सहेलियों के साथ रैली में आई थीं.
सिर पर साड़ी का पल्लू संभालते हुए उन्होंने बताया कि रामविलास पासवान कब किस गठबंधन में शामिल हुए और कब किससे हटे, उन्हें यह पता नहीं है. पिछले चुनाव में लोजपा के कहने पर उन्होंने 'लालटेन छाप' को वोट दिया था. इस बार भी पासवान जी की पार्टी जिसे कहेगी उसे ही वोट देंगी.
गीता देवी के मुताबिक़ उनके लिए यह बात मायने नहीं रखती है कि उनके क्षेत्र में लोजपा का कोई उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरता है या नहीं.
पासवान के एनडीए में वापसी को महेश राम इस मुहावरे के साथ जायज़ ठहराते हैं, ‘बिहाने के भुलाइल, सांझ के मिल जाइ त ऊ भुलाइल ना कहाला.’
मुज़फ़्फ़रपुर जिले के मुस्तफ़ापुर गांव के महेश के मुताबिक़ पासवान पाला बदलते रहते हैं. लेकिन काम भी करते हैं.
गांव में लोग पहले से कह रहे थे कि फूल छाप को वोट देंगे और रामविलास जी भी ऐसा ही करने को कह रहे हैं. हम चुनाव के समय उनकी बात मानेंगे.
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