'इनकी नन्हीं उंगलियों में कलम नहीं कपास है'

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- Author, जॉन नील
- पदनाम, प्रोड्यूसर, 'यू एंड योर्स', बीबीसी रेडियो 4
सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण भारत में कपास की खेती में बाल मज़दूरों का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है.
राधा 11 साल की है. वह तीन साल से कपास के खेतों में काम कर रही है.
राधा ने बताया, "मेरे माता-पिता ने स्कूल भेजना बंद कर दिया. उन्हें खेतों पर काम करवाने के लिए मेरी ज़रूरत थी. मैं सुबह 5 बजे उठ जाती हूं. 6 बजे तक खेतों पर पहुंचती हूं. वहां कपास के फूलों के परागण का काम करती हूं. फिर खेत से घास-फूस निकालती हूं."
राधा आंध्र प्रदेश की रहने वाली है. वहां राधा जैसे और कई बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते. वे कपास के खेतों में काम करते हैं.
फूलों का परागण
एक आकलन के अनुसार भारत भर में कपास के खेतों में 18 साल से कम उम्र के 4,00,000 से भी ज़्यादा बच्चे काम करते हैं.
अमरीका में 'अंतरराष्ट्रीय श्रम अधिकार मंच' ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया है कि 4,00,000 में से आधे बच्चों की उम्र 14 साल से भी कम होती है.
ये बच्चे प्रमुख रूप से कपास के फूलों के परागण का काम करते हैं. परागण करने के लिए नर फूलों को तोड़कर उन्हें मादा फूलों पर रगड़ा जाता है.
कपास के फूलों का परागण कड़ी मेहनत वाला काम होता है, इससे कपास की बेहतर फसल मिलने में किसानों को मदद मिलती है.
कपास की खेती करने वाले अधिकांश किसान इस तरह के कामों के लिए बच्चों का चुनाव करते हैं क्योंकि बच्चों की उंगलियां अधिक फुर्तीली होती हैं और उनका कद फसल के कद जितना ही होता है.
'सस्ता श्रम'

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एक तरफ भारत सरकार कहती है कि खेतों में काम करने वाले 5 से 14 साल के बाल श्रमिकों की तादाद घट रही है. मगर हकीक़त कुछ और है.
भारत के गांवों में कपास के खेतों में बच्चों को धड़ल्ले से काम पर लगाया जा रहा है. सस्ता श्रम होने और काम के लंबे घंटे के कारण किसान बच्चों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.
आंध्र प्रदेश के किसान वेंकटराम रेड्डी बताते हैं, "हमारे खेतों पर ढेर सारे बच्चे काम करते हैं. कई बार जब अचानक बारिश होने लगती है तो हम उन्हें प्लास्टिक की पन्नी दे देते हैं. ये बच्चे इन पन्नियों को अपने सिर पर डाल अपना काम जारी रखते हैं."
रेड्डी आगे कहते हैं, "इस तरह की परिस्थितियों में काम करना बड़ों के लिए अक्सर संभव नहीं होता. वे बच्चों की तरह कड़ी मेहनत भी नहीं करते. यही नहीं, वे काम पर वक्त पर नहीं आते. जबकि हम दोनों को एक की मजदूरी देते हैं. मगर बच्चे ज़्यादा ईमानदारी से काम करते हैं."
लड़कियों की संख्या
आंध्र प्रदेश में <link type="page"><caption> कपास</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2012/03/120309_india_cotton_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> की खेती करने वाले वेंकटराम रेड्डी विस्तार से बताते हुए कहते हैं, "बच्चों में भी लड़कियां ज़्यादा बेहतर काम करती हैं. लड़के तो जब देखो खेत पर इधर-उधर भागते रहते हैं. अब यदि उन्हें पीटो तो काम छोड़ देते हैं. मगर फिलहाल हमारे खेतों पर ज़्यादातर बड़े ही काम कर रहे हैं."
हालांकि रेड्डी ये भी बताते हैं कि बाल मज़दूरों के चलते उन्हें चेतावनी भी मिली है. उन्होंने बताया,"हमने बच्चों को काम पर रखना बंद कर दिया है क्योंकि हमें चेतावनी मिली है कि यदि हमने ऐसा किया तो मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है."
ब्रिटेन में खुदरा विक्रेताओं को काम की बुरी स्थितियों और आपूर्ति श्रृंखला में बाल श्रमिकों के उपयोग न हो, इससे बचने के लिए एक आचार संहिता बनाई गई है. यहां इसके तहत काम करना होता है.
ब्रिटेन खुदरा विक्रेता आमतौर पर पूरी तरह तैयार परिधान खरीदते हैं. वे ब्रिटेन के निर्माण कारखानों के साथ व्यापार समझौता करते हैं, मगर कच्चे माल के उत्पादन का पता लगाना मुश्किल होता है.
कारख़ाना पहुंचने के पहले कपास दर्जनों बार खरीदा-बेचा जाता है. कारोबारी कई माध्यमों से इसे खरीदते हैं. कपास को अक्सर कारखाने में मिक्स किया जाता है. इसलिए ये जानना मुश्किल होता है कि कपास की एक बोरी खेत से निकल कर किन रास्तों से कारख़ाने पहुंचती है.
'हाथ कट गए'

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अपनी नन्हीं-नन्हीं उंगलियां से कपास बीनते समय बच्चों के हाथ कई बार ज़ख़्मी हो जाते हैं, पैरों में छाले पड़ते हैं और धूल से फेफड़ों को भी नुकसान पहुंचता है.
कपास के खेतों में ही काम की स्थितियां चिंताजनक नहीं हैं, कपास के कारख़ानों में भी यही हाल है.
प्रीति ओझा 'प्रयास सेंटर फ़ॉर लेबर रिसर्च एंड ऐक्शन' के लिए काम करती हैं. भारत के कारख़ानों में काम की दशाओं को सुधारने के लिए वे लंबे समय से काम कर रही हैं.
प्रीति बताती हैं, "साल 2005 से कपास के कारख़ाने में काम करने वाले बच्चों की तादाद घटी है. इसके बावजूद बड़ी तादाद में पड़ोसी राज्य राजस्थान से बच्चे यहां काम करने आते हैं."
वे कहती हैं, "कारखाने के मालिक बाल मजदूरों का न तो नाम पता दर्ज करते हैं और न ही कारखाने के भीतर किसी बाहरी व्यक्ति को आने देते हैं. इसलिए कुछ भी पता लगाना बहुत मुश्किल है."
16 साल की सोनल अपने माता पिता के साथ गुजरात के छोटे से गांव में रहती है. सोनल के चार भाई-बहन है.
पिछले साल जब वह कारख़ाने में काम कर रही थी तो मशीन में हाथ आ जाने से उसके हाथ कट गए.
सोनल बताती है, "मैं सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक वहां काम करती थी. मेरा हाथ कब मशीन में चला गया मुझे पता ही नहीं चला."
सोनल को इलाज और मुआवज़े के नाम पर कारख़ाने की ओर से कुछ दवाइयां और मात्र 10 हजार रुपए मिले.
पश्चिमी दबाव

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ब्रिटेन की संस्था 'ब्रिटिश रिटेल कोनसोरशियम' का कहना है कि परिधान और वस्त्र आपूर्ति की श्रृंखला में महत्वपूर्ण सुधार आए हैं. उनका ये भी कहना है कि कपास उद्योग के कुछ हिस्सों से मानवाधिकार उल्लंघन की आ रही खबरों से ब्रिटेन के खुदरा विक्रेता और ग्राहक चिंतित हैं.
मार्क्स और स्पेंसर, जॉन लूईस, एच एंड एम, इकी और सेन्सबरी जैसी कंपनियों का कहना है कि वे फ़ेयरट्रेड, बेटर कॉटन इनिशिएटिव और कॉटन कनेक्ट जैसी अलग अलग संस्थाओं के साथ काम कर रही हैं ताकि किसानों के लिए स्थितियां बेहतर हों और आपूर्ति श्रृंखला ज्यादा पारदर्शी बन सके.
पश्चिम के दबाव के कारण भारत के भीतर कपास आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव तो आ रहा है, मगर देश के भीतर इस तरह का कोई दबाव मौजूद नहीं है.
भारत में बेकाबू हो रही ग़रीबी, मंहगाई, बेरोज़गारी और उद्योंगों पर नियमन की कमी जैसी समस्याएं मौजूद हैं. ऐसे में यहां के लोगों का बदलना काफी मुश्किल नजर आता है
इसके अलावा एक और समस्या है. देश में जहां ग़रीब और अमीर के बीच खाई बढ़ती जा रही, भारत का मध्य वर्ग ज़्यादा कपड़े खरीदने लगा है. चिंता की बात ये है कि उन्हें आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े पश्चिमी सरोकारों से कोई मतलब नहीं है.
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