बॉलीवुड ने बढ़ाई फ़िटनेस के लिए बेकरारी?

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- Author, दीक्षा बसु
- पदनाम, लेखक और एंकर
मुंबई में रविवार को 14वीं सालाना मैराथन होगी. इस दौड़ में दुनिया भर से क़रीब 50 हज़ार लोगों के शामिल होने की उम्मीद है.
वर्ली में समुद्र तट से शुरू होकर कारोबारी केंद्र नरीमन प्वाइंट पर ख़त्म होने वाली इस मैराथन में शामिल होने के लिए हर वर्ग और उम्र के लोग उत्साह के साथ तैयार हैं. दिन शुरू होते ही लोग सही जगह पाने के लिए कार और साइकिल से वहां पहुंचेंगे.
भारत में फ़िटनेस एक महत्वपूर्ण कारोबार के रूप में उभर रहा है और मैराथन की बढ़ती लोकप्रियता इसका सबूत है.
मैंने तीन साल पहले न्यूयॉर्क शहर में जुंबा शुरू किया. नृत्य और कसरत के मेलजोल से बनी यह शैली उन लोगों के लिए एकदम सही है, जिनमें ऊर्जा काफ़ी अधिक है और एकाग्रता की कमी है.
पिछले साल से मैं सप्ताह में चार बार जुंबा की क्लास में जा रही हूं और जिस दिन मैं नहीं जा पाती, उस दिन काफ़ी बेचैनी महसूस करती हूं. ऐसी निर्भरता के चलते ही जब हाल में मैं कुछ महीनों के लिए भारत आई थी, तो वास्तव में मैं अपनी दिनचर्या को लेकर तनावग्रस्त हो गई.
सुखद अनुभव

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पिछले महीने मुंबई में अपनी पहली जुंबा क्लास में 10 मिनट पहले पहुंच गई. एक नए निर्देशक के साथ पहली क्लास में पहली डेट से भी अधिक घबराहट होती है.
क्या आप इसे कर पाएंगे? क्या यह बहुत ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होगा? क्या आप घूम पाएंगे? क्या क्लास का समय आपके लिए सही होगा?
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लेकिन सत्र के अंत में मैं बहुत खुश थी और मैंने महसूस किया कि मुंबई में मेरी पहली कक्षा का अनुभव एकदम सही था. अगले दिन एक अन्य स्टूडियो में मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ. निर्देशक बेहतरीन था और ज़्यादातर छात्र भी बेहद प्रभावशाली थे.
पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान जितने भी प्रशिक्षुओं से मेरी मुलाक़ात हुई, उनकी बॉलीवुड नृत्य की एक मज़बूत पृष्ठभूमि थी. यह स्वाभाविक है कि जुंबा को भारत में कामयाब होना ही था. यहां तक कि हमारे लिए सर्वाधिक लयबद्ध चुनौती बॉलीवुड संगीत से संबंधित है.
हमने शादियों में यह नृत्य किया है और इसमें जुंबा क्लास के मुक़ाबले काफ़ी अधिक उछलकूद होती है और बात केवल जुंबा की नहीं है. भारत ने तंदुरुस्ती को जिस तरह देखना शुरू किया है, उसके लिए बॉलीवुड को धन्यवाद दिया जाना चाहिए.
बढ़ती जागरूकता

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मुझे दिल्ली में 1990 के दशक के अपने शुरुआती दिन याद हैं, जब मुश्किल से ही जिम दिखाई देते थे. यहां तक कि फ़िल्मी सितारे भी मोटे होते थे. फ़िटनेस को लेकर एक तरह का उन्माद हमेशा से रहा है. मोटर साइकिल सवारी, बाइसेप्स पर इतराते पुरुष, लेकिन यह देखना रोचक है कि शहरी मुख्यधारा में सेहत शामिल हो रही है.
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ज़ाहिर है, इस दिशा में आगे बढ़ने के जोखिम भी हैं और युवा महिलाओं की एक पीढ़ी में खानपान से जुड़ी विसंगतियों को बढ़ावा मिल सकता है और बॉलीवुड अभिनेत्री बिपाशा बसु की तरह दिखने की चाहत से जुड़ी शारीरिक छवि का मुद्दा भी है. मगर फ़िलहाल भरे-पूरे जिम और स्टूडियो और उत्साही लोगों को उनमें जाते देखना सुखद है.
किसी भी दशा में ऐसा लगता है कि बॉलीवुड ने अनाकर्षक चेहरे को पसंद नहीं किया है. इसलिए सिर्फ दुबलेपन की जगह अब स्वस्थ जीवन शैली पर ध्यान दिया जा रहा है. अब सभी बड़े शहरों में अनगिनत जिम और स्टूडियो हैं, जो सेहत, वित्त और ग्लैमर के स्तर पर विभिन्न वर्गों की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं.
फ़िटनेस कारोबार

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यहां किक बॉक्सिंग, स्पिनिंग, एरोबिक, पाइलेट्स और मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स जैसी कक्षाएं हैं. खुले मैदानों में दौड़, बाइकिंग और लंबी पैदल समूह यात्रा का चलन भी है. हर किसी के लिए कुछ न कुछ तो है. रीबॉक का अत्यधिक सफल और चुनौतीपूर्ण क्रॉसफ़िट वर्कआउट भारत में आ चुका है और वह देश भर में अपने जिम खोल रहा है.
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बीते महीने वर्ली में सैर के दौरान मैंने "फ़िटनेस स्टेशन" पर ध्यान दिया. यह एक बस स्टॉप की तरह दिखता है, लेकिन यहां हर तरह की कसरत के लिए बार और बैंच हैं. लोग लगातार उनका इस्तेमाल कर रहे थे. लगता है कि ये भारत के फ़िटनेस कारोबार में दिलचस्पी दिखाने और निवेश करने का एकदम सही समय है.
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