जब कलाशनिकोफ़ राइफ़ल से पहली बार सामना हुआ

- Author, सुहैल अकरम
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
एके47 राइफ़ल के जनक मिखाइल कलाशनिकोफ़ की मौत की ख़बर ने मेरे वजूद को एक अजीब एहसास से भर दिया है.
मैं कश्मीर में पला बढ़ा हूँ और बीते 25 सालों में, जो मैंने वहाँ गुजारे हैं, न जाने कितनी कलाशनिकोफ़ राइफ़लें हमने वहाँ देखी होंगी.
अशांत क्षेत्रों में बड़े होने वाले ज्यादातर बच्चों की तरह शुरुआती दौर में मेरी भी दिलचस्पी फौज़ की मौजूदगी और उनके हथियारों को लेकर रहीं और जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया कलाशनिकोफ़ राइफ़लों के लिए मेरा आकर्षण और डर भी, दोनों साथ साथ बढ़ने लगे.
उन दिनों शाम के वक्त खेल-कूद के बाद लगने वाली जमघटों में पड़ोस की लड़कियाँ, मैं और मेरे दोस्त बंदूकों के बारे में बात किया करते थे.
तब मैं और मेरे दोस्तों की उम्र कोई आठ से 12 बरस के दरम्यां रही होगी. उन बातों में किस्सागोई थी, खिलंदड़पना था. हमें लगता था कि हम बड़े होकर बड़ी बंदूकों वाले बड़े मर्द बनेंगे.
हम खुसुरफुसुर किया करते थे, क्या जाने हमारे वालिदैन हमारी बातें सुन लेतें, वे बातें जिनके जिक्र तक की मनाही थी.
कश्मीर ने अपने कई नौजवानों को हथियारों की ट्रेनिंग के लिए नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर जाते हुए देखा था.
उन नौजवानों को कश्मीर वापस लौट कर 'भारत की हुकूमत' से जंग लड़नी थी. मेरे माँ-बाप भी दूसरे वालिदैन की तरह ऐसे सियासी हालात में हमें बड़ा होते हुए देखकर डरे सहमे से थे.
कश्मीर के हालात

कश्मीर में उन हालात में किसी के हाथ में कलाशनिकोफ़ राइफ़ल का आना जाना एक आसान सी बात थी.
हमारे लिए सादी खाकी पहने हुए जवान सीआरपीएफ के थे, उनकी हाथों में थोड़ी लंबी एसएलआर राइफ़लें हुआ करती थीं और हमें उनसे डर नहीं लगता था.
मेरे जैसे जवान होते लड़के के लिए एसएलआर बहुत बोझिल सा हथियार था. ये मुझे जरा सा भी अपील नहीं करता था.
और वहाँ वो फौज़ी भी थे जो सिर पर खास तरह की जाली वाली हेलमेट पहना करते थे. उनके हाथों में छोटा मगर मोटा सा स्टेनगन हुआ करता था और सबसे खतरनाक लगते थे राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवान.
उनके पास डरावना कलाशनिकोफ़ राइफल होता था और उनकी मूँछें भी लंबी होती थी. मैंने कलाशनिकोफ़ को हमेशा ही सवालिया लहजे से देखा था.
यह राइफ़ल देखने में ही अपशकुन जैसा लगता था. जिनके हाथों में कलाशनिकोफ़ राइफ़लें हुआ करती थीं, वे धमकाने वाले लहजे में बातें किया करते थे.
हम कलाशनिकोफ़ लफ्ज़ का उच्चारण अपने खास कश्मीरी लहजे में किया करते थे, 'कलशुन्कोफ़' और जैसे जैसे साल गुजरते गए 90 के दशक के मध्य में कश्मीर में हालात बेहद खराब होते गए.
तकबीन हर रोज कोई मुठभेड़ होता था या कहीं गोला-बारी होती थी. हमारे दोस्त एक दूसरे को उकसाया करते थे और यहाँ तक कि हम लोग इस बात पर भी शर्त लगाते थे कि हल्की मशीनगनों से कलाशनिकोफ़ की आवाज़ निकलती है.
खिलौने की तरह...

दोनों ही हथियारों से आने वाली आवाज़ें अलग अलग होती थीं, कलाशनिकोफ़ की आवाज तीखी होती थी जबकि हल्की मशीनगनों की आवाज़ भारी और गहरी हुआ करती थी.
कश्मीर में चरमपंथी हो या सिपाही, दोनों ही कलाशनिकोफ़ राइफ़लों का बराबरी से इस्तेमाल करते थे. हजारों बेगुनाह लोग मारे गए हैं.
<link type="page"><caption> (दुनिया का सबसे मारक हथियार)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2011/09/110927_gallery_ak47_ms.shtml" platform="highweb"/></link>
उन दिनों कश्मीर में ढेर सारा असलहा हुआ करता था, कलाशनिकोफ़ का कल्चर था, यहीं रोमांस भी था और यही संविधान भी.
लेकिन इन्हीं हालात में कुछ ऐसे लम्हें भी आए जब कश्मीर में कलाशनिकोफ़ राइफ़लों का खिलौनों की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा. ये तब की बात है जब मैं 12 बरस का था.
मोहल्ले की गलियों में खेला जाने वाला एक क्रिकेट मैच कुछ ही लम्हें पहले बेहद शोर शराबे के साथ खत्म हुआ था.
कई नौजवान टॉस और अगले मैच में पहले कौन खेलेगा, इस बात पर झगड़ रहे थे. सभी टीमें एक दूसरे को डरा धमका रही थीं तभी एक नौजवान ने अचानक ही अपने लबादे के भीतर से एक जंग लगा हुआ पुराना कलाशनिकोफ़ राइफ़ल निकाल लिया.
एक लम्हें के लिए वहाँ भयानक सन्नाटा छा गया और उसके बाद पूरा मैच बिना किसी शोर शराबे के खेला गया.
यह खामोशी से मातम मनाने जैसा था. जब कोई छक्का लगा या या कोई चौका भी, किसी ने भी ताली नहीं बजाई.
मिखाइल कलाशनिकोफ़ के इस आविष्कार से मेरी मुलाकात उस रोज हो गई और कलाशनिकोफ़ राइफ़ल की अजीब सी ताकत का एहसास भी पहली बार मुझे उसी दिन हुआ.
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