सेंसर और कैमरों से की जाएगी बाघों की गिनती

बाघ

भारत में हर चार साल पर होने वाली बाघों की गिनती का काम शुरू हो रहा है. इससे यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि हाल ही में बाघों की संख्या में हुई बढ़ोतरी क्या अब भी कायम है.

अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले अखबार 'दि हिंदू' के अनुसार 2,000 से ज़्यादा प्रशिक्षित लोगों को बाघ खोजने के लिए एक हफ़्ते के अभ्यास सत्र के लिए फ़ील्ड में भेजा गया है.

ये लोग पारंपरिक तरीकों के अलावा सेंसर और कैमरो का भी इस्तेमाल करेंगे. पारंपरिक रूप से पंजों के निशान और मल से पहचान की जाती है.

हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने अब तक इस्तेमाल हो रहे तरीकों को 'दोषपूर्ण और अप्रचलित' बताया है.

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'दि न्यू इंडियन एक्सप्रेस' अख़बार ने बाघ बायोलॉजिस्ट उल्लास कारांथ के हवाले से कहा है कि कई बार अनुभवी खोजी भी इसमें ग़लतियां कर देते हैं.

संख्या में वृद्धि

हाल ही में हुई बाघों की गिनती के दौरान उनकी संख्या में वृद्धि दिखाई गई है.

साल 2006-07 में हुई गणना में बाघों की संख्या 1411 थी और उसके मुकाबले 2010-11 में यह संख्या बढ़कर 1706 हो गई थी.

हालांकि यह भी पता चला कि बाघों को शिकारियों से अब भी ख़तरा है और यह एक छोटे से इलाक़े में सिमटकर रह गए हैं.

हिंदू अख़बार के अनुसार इन्हीं चार सालों में बाघों के रहने की जगह 93,697 वर्ग किलोमीटर से घटकर 81,881 किलोमीटर रह गई है.

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