किस मोड़ पर आ गए हैं भारत में समलैंगिक?

- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
"हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ अँधेरा है, पाखंड और दोहरे मानदंडों का बोलबाला है." एक भारतीय लेखक ने समलैंगिकता को अपराध ठहराने वाले कानून को वैध करार देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया कुछ इन शब्दों में दी.
इस फ़ैसले के खिलाफ व्यापक तौर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को समझा जा सकता है. भारत का समलैंगिक समुदाय सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सदमे में है.
साल 2009 में समलैंगिकता को अपराध न मानने के दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिए अपने निर्णय से पलट दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने अब 153 साल पुराने क़ानून की धारा 377 पर फैसला करने का सवाल संसद पर छोड़ दिया है. धारा 377 एक ही लिंग के लोगों के यौन संबंधों को 'अप्राकृतिक अपराध' मानती है और इसके लिए 10 साल की सज़ा का प्रावधान है.
साल 2009 में दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले की कई नेताओं, सामाजिक संगठनों, मज़हबी गुटों और कुछ लोगों ने मुख़ालफ़त की थी. उस फ़ैसले के विरोध में उठने वाली कई आवाज़ें तो अजीबोगरीब थीं.
पुरुषों की वेश्यावृत्ति!

टीवी पर भविष्यवाणी करने वाले एक व्यक्ति ने अदालत में दायर याचिका में कहा, "समलैंगिकता से राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा हो जाएगा क्योंकि फौज़ी एक दूसरे से यौन संबंध बनाने लगेंगे." एक पूर्व सांसद ने कहा कि यह 'भारतीय संस्कृति के खिलाफ' है.
'ज्वॉइंट ऐक्शन कमेटी' नाम के एक संगठन ने कहा कि इससे 'पुरुषों की वेश्यावृत्ति का चलन बढ़ेगा.'
एक मशहूर योग गुरू के प्रवक्ता ने कहा कि वे 'योग के ज़रिए समलैंगिकता का इलाज' कर सकते हैं. ईसाई समुदाय से जुड़े एक संगठन ने बयान दिया कि इससे 'ईसाई हितों को नुकसान' पहुँचेगा.
एक मुस्लिम संगठन ने दावा किया कि गुदा मैथुन इस्लाम में प्रतिबंधित है. हालांकि इन विचारों की मुख़ालफ़त कर रहे कुछ ऐसे संगठन भी थे जिन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के समर्थन में अपनी याचिकाएँ दायर की थीं. इनमें समलैंगिक लोगों, उभयलिंगी लोगों और ट्रांसजेंडर लोगों के अभिभावक भी थे.
उनकी भी अपनी कहानी है कि पीछे की ओर ले जाने वाले औपनिवेशिक काल के इस कानून ने उनके और उनकी पारिवारिक जिंदगी में किस तरह से परेशानियाँ खड़ी कर दीं.
याचिका दायर करने वाले लोगों में मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल, अकादमिक जगत से जुड़ीं कुछ नामचीन शख्सियतें और ट्रांसजेंडर मरीज़ों का इलाज करने वाले कुछ मनोचिकित्सक भी शामिल थे.
समलैंगिक समुदाय

समाजविज्ञानी संजय श्रीवास्तव कहते हैं, "लकीर के फ़कीर लोग अब जीत गए हैं. ये एक अनूठा और विचित्र फैसला है. कोई अदालत किस तरह से लोगों का मौलिक अधिकार छीन सकती है, ख़ासकर वो अधिकार जो उन्हें पहले से ही दे दिया गया था. समलैंगिक समुदाय को बड़ा झटका लगा है. और इससे दुनिया भर में भारत का खूब मज़ाक बना है."
कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि फैसला देने वाले जज को समलैंगिक समुदाय से बहुत कम सहानुभूति थी और मुमकिन है कि वे समलैंगिक लोगों को निजी तौर पर नहीं जानते हैं.
कोर्ट ने साल 1986 के अमरीकी सर्वोच्च अदालत के एक फ़ैसले का हवाला दिया जिसमें जॉर्जिया में आपसी सहमति से समलैंगिकों के यौन संबंध को अपराध करार दिया गया था. हालांकि साल 2003 में इस फ़ैसले को पलट दिया गया था.
भारत में समलैंगिक लोगों के लिए खुले आम जीवन जीना कभी भी बहुत आसान नहीं रहा. समलैंगिक पुरुषों के साथ काम करने की जगह पर असामान्य व्यवहार किया जाता रहा है. उन्हें साथी खोजने में भी परेशानी पेश आती है. समलैंगिक महिलाओँ को बहुत ही खराब नज़र से देखा जाता रहा है.
पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम डॉक्टर कहते हैं कि साल 2009 के फ़ैसले से समलैंगिक समुदाय को बड़ा सहारा मिला था. कई लोग अभी खोह से बाहर निकल ही रहे थे कि अदालत के इस फ़ैसले ने उन्हें झटका दे दिया. जब एक बार लोग बाहर निकल आते हैं तो उनका वापस लौटना इतना आसान नहीं होता.
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