अगर बन गईं 80 साल की विधायक..

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लूनी (राजस्थान) से
धूल उड़ाता गाड़ियों का एक क़ाफ़िला गांव में दाख़िल होता है. घूंघट किए तीन महिलाएं उतरती हैं. एक महिला काफ़ी बुज़ुर्ग हैं, बाक़ी दो उन्हें सहारा देकर सभा में ले जाती हैं.
इलाक़े से कांग्रेस की उम्मीदवार, 80 साल की अमरी देवी विश्नोई, सभा में बैठती हैं और नेताओं को बोलते हुए सुनती हैं.
वो राज्य की कांग्रेस सरकार के काम का हवाला देते हैं और विश्नोई परिवार के राजनीति से लंबे रिश्ते की याद दिलाते हुए वोट के लिए अपील करते हैं.
सभा ख़त्म हो जाती है और अमरी देवी भी लौटने लगती हैं. मैं दौड़कर उन्हें रोकते हुए पूछती हूं कि आप उम्मीदवार हैं कुछ बोलेंगी नहीं क्या, कि इलाक़े के लिए क्या करना चाहती हैं?
अमरी देवी कहती हैं, “सोनिया गांधी जी ने मुझे टिकट दिया है, अब जो मेरे बच्चे-पोते चाहें, वही मैं चाहूं.”
दरअसल अमरी देवी के बेटे मलखान सिंह विश्नोई राजस्थान के लूनी विधानसभा क्षेत्र से मौजूदा विधायक हैं. ये और बात हैं कि इस वक्त वो भंवरी देवी की हत्या और उसकी साज़िश रचने के मामले में जेल में बंद हैं.
विधान सभा मैं जाऊं, काम बच्चे करें
मारवाड़ी भाषा में मुझसे बातचीत करते हुए अमरी देवी बोलीं कि जैसे मैं 'छोटी सी' अपना काम कर पा रही हूं, वैसे ही वो भी समाज की सेवा कर लेंगी.
फिर मैंने पूछा कि विधानसभा में अपनी बात कैसे रखेंगी, वहां तो ख़ुद ही जाना होगा, तो बोलीं, “विधानसभा मैं जाऊं पर काम देखने के लिए मेरे तीन बेटे, तीन बहू, और छह पोते हैं.”
अमरी देवी जितनी सरलता से अपनी उम्मीदवारी को पूरे परिवार से जोड़ रहीं थीं, तो मैंने पूछा की किसी ऐसे व्यक्ति को टिकट क्यों ना दिया जाए जिसका परिवार राजनीति से ना हो पर जिसने राजनीति में अच्छा काम किया हो.
अमरी पहले तो हंस पड़ीं, फिर बोलीं कि हम उनके घर चलें तो उनका काम पता चलेगा. वो दिखाएंगी कि पिछले 40 सालों से उनके पति राम सिंह विश्नोई से मिलने के लिए घर आने वाले आम लोगों के लिए रोटियां बनाते-बनाते उनके हाथों में कैसे छाले पड़ गए हैं.
वोट पार्टी को, उम्मीदवार को नहीं
अमरी देवी से मिलने के बाद मैं निकली लूनी विधानसभा क्षेत्र में उनके प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी के जोगाराम पटेल से मिलने.
सालासार गांव की एक जनसभा के बाद बातचीत में उन्होंने कहा, “जिस महिला ने नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई नहीं की, जो अशिक्षित हैं, वो पढ़े लिखे लोगों के लिए विधानसभा में बैठकर क़ानून कैसे बनाएंगीं.”
पर यही सवाल जब मैंने गांव के एक बुज़ुर्ग से पूछा, तो वो बोले, “हमने हमेशा कांग्रेस को वोट दिया है, और अब भी देंगे, पार्टी सबसे बड़ी होती है, उम्मीदवार चाहे कोई खड़ा हो.”
पर जनसभा की भीड़ छंटी तो क़रीब 40 साल की एक महिला मिलीं, उनकी बातों में वही हताशा थी जो राजस्थान के कई ग्रामीणों में पिछले दिनों में मैंने देखी.
वो बोलीं, “वोट तो मैं इसे दे दूंगी, पर इसे मेरी फ़िक्र कहां, ये या इसकी पार्टी मेरे खेत पर हवाई जहाज़ थोड़े ही उड़ाएगी, ये तो अब फिर पांच साल बाद ही दिखेंगे वोट मांगते हुए, बाक़ी समय मेरी ज़िन्दगी और उसकी परेशानियां वैसी ही बनी रहेंगी.”
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