पटना पुस्तक मेलाः चुनौती की लहर के बीच शब्दों की नैया

- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पटना के कदमकुंआ इलाके में रहने वाले विनोद रंजन उन लाखों शहरियों में से एक हैं जो पुस्तकप्रेमी भी हैं और वक़्त निकालकर ऐतिहासिक गांधी मैदान की सैर करना भी पसंद करते हैं.
उन जैसे लोगों का शौक गांधी मैदान में सजा 20वाँ पटना पुस्तक मेला बीते दो सप्ताह से पूरा कर रहा है.
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27 अक्तूबर के बम धमाके के बाद रोज़ हजारों की तादाद में लोगों का गाांधी मैदान पहुंचना न सिर्फ़ उनके पुस्तक प्रेम को बताता है बल्कि यह भी बता रहा है कि वे बम धमाकों के ख़ौफ़ को पीछे छोड़ चुके हैं.
'सेंटर फ़ॉर रीडरशिप डेवलपमेंट' (सीआरडी) के बैनर तले 10 नवंबर को शुरू हुआ यह मेला 24 नवंबर तक चलेगा.
इस बार मेले की थीम 'युवा प्रतिनिधित्व' है. पुस्तक मेले की शुरुआत 28 साल पहले 1985 में हुई थी.
चुनौती

समय के साथ यह मेला भी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. जिनमें सबसे प्रमुख है प्रकाशकों ओर पाठकों की लगातार घटती संख्या.
पिछले पांच साल की बात करें, तो जहां 2009 में 387 प्रकाशकों और वितरकों ने भाग लिया था, वहीं इस साल मार्च में हुए मेले में इनकी संख्या घटकर 207 रह गई.
हालांकि अक्तूबर में इनकी संख्या थोड़ी बढ़कर 243 हुई है.
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पटना पुस्तक मेला जिस दूसरी चुनौती से रूबरू है, वह यह कि अब भाग लेने वाले प्रकाशकों में साहित्य या वैचारिक पुस्तक प्रकाशकों की संख्या लगातार घट रही है.
अब बड़ी संख्या में पाठ्य पुस्तकें और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारियां करने वाले प्रकाशक इसमें शामिल हो रहे हैं.
घटते पाठक

सीआरडी के आंकड़ों के अनुसार जहां 2009 में लगभग सात और 2010 में लगभग सवा छह लाख पाठकों ने भाग लिया था.
वहीं इस साल मार्च में आयोजित मेले में लगभग साढ़े चार लाख पुस्तक प्रेमी ही पहुंचे.
इस संबंध में सेज पब्लिकेशंस के प्रमेंद्र शर्मा कुछ दूसरी चिंताओं की ओर भी इशारा कहते हैं.
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उनके अनुसार न सिर्फ पढ़ने वाली की संख्या घट रही है बल्कि पाठकों के बीच अब गंभीर किताबों की मांग भी कम हो रही है.
साथ ही ज़्यादा छूट, होम डिलीवरी के बाद भुगतान का विकल्प, ई-बुक्स की उपलब्धता की वजह से पाठक अब पटना में भी धीरे-धीरे किताबों की ऑनलाइन ख़रीद की ओर रुख़ कर रहे हैं.
ऐसे में मेले में भाग लेने वाले प्रकाशकों का व्यापार सिकुड़ता रहा है.
लाभदायक आयोजन

इन चुनौतियों के बावजूद व्यवसायिक रूप से पटना पुस्तक मेला अब भी एक सफल आयोजन बना हुआ है.
हालांकि सीआरडी के अधिकारियों ने यह जानकारी नहीं उपलब्ध कराई कि उन्हें हाल के सालों में कितना लाभ हुआ है, लेकिन उन्होंने माना कि आर्थिक रूप से भी यह एक सफल आयोजन है.
पटना पुस्तक मेले में किताबों की बिक्री भी कई प्रकाशकों का हौसला बढ़ाती है.
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इस बारे में राजकमल प्रकाशन के पटना शाखा के प्रबंधक रामनरेश सिंह ने बताया कि पिछले पांच सालों के दौरान मेले में किताबों की बिक्री 10 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.
उन्होंने जोड़ा कि मार्च में लगे मेले में उन्होंने लगभग पांच लाख की किताबें बेची थीं.
दूसरा पक्ष

दूसरी ओर ऐसे प्रकाशकों और वितरकों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है, जो अब मेले में भाग नहीं लेते. उनके अपने-अपने तर्क हैं.
इस संबंध में जानकी प्रकाशन के नंद किशोर सिंह का कहना है कि लगातार महंगाई के कारण पिछले आठ साल से मेले में भाग नहीं ले पा रहे क्योंकि मेले में स्टॉल लगाने का मतलब है पूंजी का नुक़सान.
जानकी प्रकाशन तो अपेक्षाकृत छोटा प्रकाशक है लेकिन ओरिएंट ब्लैकस्वान जैसे बड़े वितरक के लिए भी अब पटना पुस्तक मेला लाभदायक नहीं रह गया है.
पटना में क्षेत्रीय कार्यालय रखने के बावजूद वे बीते दो सालों से मेले में शमिल नहीं हो रहे हैं.
इसकी वजह कंपनी के वरीय अधिकारी नवनीत रंजन कुछ यूं बताते हैं, "पहले हम बहुत उत्साह से भाग लेते थे, लेकिन हमने देखा कि मेला हमारे प्रचार-प्रसार के ही ज़्यादा काम आ रहा था. वहां होने वाला व्यापार हमारे लिए फायदेमंद नहीं रह गया था."
सांस्कृतिक महोत्सव

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले और कोलकाता के इंटरनेशनल बुक फेयर के साथ-साथ पटना पुस्तक मेले की भी एक खास पहचान है.
इसने न सिर्फ पुस्तकों और पाठकों के बीच की दूरी कम करने का काम किया है, बल्कि मेले पर क़रीब की नज़र रखने वालों के अनुसार अब यह एक सांस्कृतिक महोत्सव में तब्दील हो चुका है.
पुस्तक मेला में नुक्कड़ नाटक, जनसंवाद, फिल्म महोत्सव, कवि-सम्मेलन, मुशायरा, चित्र प्रदर्शनी जैसे कई कार्यक्रम हर साल आयोजित होते हैं.
रंगकर्मी अनीस अंकुर कहते हैं, "मेले में हर दिन होने वाले नुक्कड़ नाटकों ने न सिर्फ इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है बल्कि इसने कई नाट्य संस्थाओं को नुक्कड़ नाटक करने के लिए प्रेरित भी किया है."
वहीं सीआरडी के अध्यक्ष और लेखक रत्नेश्वर दावा करते हैं, "पटना पुस्तक मेला सांस्कृतिक परिवर्तन का भी केंद्र बना है और ऐसा करने वाला यह दुनिया का एकमात्र पुस्तक मेला है."
उत्साह कायम

अब तक लगभग साढ़े तीन लाख से ज्यादा पाठकों ने पुस्तकों की इस दुनिया की सैर की है.
यह इस बात का प्रमाण है कि पुस्तक प्रेमी इसका पूरा आनंद उठाते हुए पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति को मज़बूत कर रहे हैं.
साथ ही यह एक भरोसा पैदा करता है कि छपे हुए शब्दों के संसार पर फिलहाल कोई बड़ा ख़तरा दुनिया के इस हिस्से में नहीं है.
इस सबके बीच एक और बात दिलचस्प है, वो यह कि प्रकाशक नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, दोनों पर लिखी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार में समान रूप से रुचि दिखा रहे हैं और पटना के पाठक उन्हें निराश भी नहीं कर रहे हैं.
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