जब सियासत में नंगे पाँव घूमने की मजबूरी हो

- Author, ऋषि पांडे
- पदनाम, भोपाल से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
सियासत इम्तहान लेती है. मध्यप्रदेश के पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी ऐसा ही एक इम्तहान पिछले सात सालों से दे रहे थे,लेकिन जब पार्टी ने उनके साथ दग़ाबाज़ी की तो वे भी इम्तहान बीच में छोड़ कर चल दिए.
उन्होंने एक प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक वे उनके विधानसभा क्षेत्र रतलाम को झुग्गीमुक्त नहीं कर देते और अनाथालय का निर्माण नहीं करवा देते तब तक नंगे पैर रहेंगे. प्रतिज्ञा लेने के समय वे प्रदेश में कैबिनेट रैंक के मंत्री थे.
कोठारी को उम्मीद थी कि वे अगली बार भी विधायक बनेंगे, लिहाजा तब अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से वे एक निर्दलीय उम्मीदवार से पिछला चुनाव हार गए.
पांच साल घर बैठने के बाद इस चुनाव में उनकी चप्पल पहनने की हसरत पूरी होने का मौका था,लेकिन भाजपा ने टिकट काटकर अडंगा लगा दिया.
उनके समर्थकों को पार्टी का फैसला रास नहीं आया और सबने हिम्मत को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने को मनाया. हिम्मत भाई नंगे पैर जुलूस लेकर फार्म भरने घर से निकल भी गए, लेकिन बीच रास्ते में उनकी हिम्मत जवाब दे गई और उन्होने चुनाव लडने से पैर पीछे खींच लिए.
जब चुनाव ही नहीं लड़ना तो संकलप कैसे पूरा होगा, लिहाजा उन्होंने उसी समय चप्पल पहनने का फैसला भी ले लिया. घर से निकले थे तब नंगे पैर थे लेकिन जब वापस घर पहुंचे तब पैरों में चप्पलें थीं.
भला हो भाजपा का जो उसकी वजह से हिम्मत भाई को सात साल से भीषण गर्मी, कीचड़ सनी सड़कों पर नंगे पैर चलने की मजबूरी से निजात मिल गयी. वरना अगला चुनाव आते आते हिम्मत कोठारी सत्तर की उमर पार कर जाते. तब न तो पार्टी उन्हें टिकट देने की हिम्मत जुटा पाती और न वे लड़ने की हिम्मत दिखा पाते.
किन्नर भी ताल ठोंकते हैं यहां

मध्यप्रदेश के चुनाव हो और किन्नरों का जिक्र न हो ये भला कैसे संभव है. देश को पहला किन्नर विधायक देने का गौरव मध्यप्रदेश के हिस्से ही आता है.
शबनम मौसी नामक यह किन्नर वर्ष 2000 में एक उपचुनाव में 18 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से जीत कर ऐसी सुर्खियों में आईं कि बॉलीवुड भी उनकी जिन्दगी पर फिल्म बनाने से खुद को रोक नहीं पाया.
शबनम ने तीन साल तक विधानसभा में बड़े-बड़े नेताओं के साथ बैठकर भाषण दिए. सवाल उठाए और अपनी छवि को नेता के तौर पर ढालने की भरसक कोशिश की. हालांकि अगले चुनाव में वे सफल नहीं हो पाईं लेकिन तब से किन्नरों को चुनाव मैदान में सफलता मिलने का क्रम जरूर शुरू हो गया.
मध्यप्रदेश ही वह राज्य है जहां दो-दो बड़े शहरों के मेयर पद पर जनता ने भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों को नकारते हुए किन्नरों को बैठाया.
इस चुनाव में भी एक किन्नर उम्मीदवार भाग्य आजमा रही हैं. जबलपुर उत्तर से हीराबाई. वे निर्दलीय नहीं लड़ रही हैं बल्कि समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया है.
हीराबाई जबलपुर में लोकप्रिय हैं. वे 1999 और 2004 में पार्षद का चुनाव भी जीत चुकी हैं.
देखना दिलचस्प होगा कि मुहल्ले के नेता के तौर पर स्वीकार की जा चुकीं हीराबाई को जनता अपने शहर का प्रतिनिधि चुनने योग्य मानती है या नहीं.
'जप तप अनुष्ठान'

धर्म ताकत है तो धर्मांधता सबसे बडी कमजोरी. यह बात किताबी ज्ञान से ज्यादा कुछ नहीं है.
राज नेताओं खासतौर पर चुनाव लड़़ने वाले नेता इतने भयभीत रहते हैं कि वे अपने भय को मिटाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.
चुनावी मौसम में प्रदेश के ऐसे अनेक मंदिर हैं जहां उम्मदवारों के भय निवारण का काम होता है. कहीं जप हो रहे हैं, कहीं तप तो कहीं विशेष अनुष्ठान.
दतिया की पीताम्बर शक्ति पीठ भक्त नेताओं की आस्था का प्रमुख के्न्द्र है.
राजस्थान में मुख्यमंत्री पद की दावेदार वसुंधरा राजे सिंधिया से लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत तमाम नेता इस मंदिर पर मत्था टेकने जरूर आते हैं.
शक्ति पीठ होने के कारण यहां विशेष अनुष्ठान भी किए जाते हैं. उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भी नेताओं का तांता लगा रहता है.
इंदौर का खजराना गणेश मंदिर, नलखेड़ा की बगलामुखी देवी का मंदिर, मंदसौर का पशुपतिनाथ मंदिर, मैहर की शारदा देवी मंदिर और देवास में चामुंडा मंदिर भी ऐसे केन्द्र हैं जहां नेताओं की जीत के लिए जप-तप हो रहे हैं.
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