राजस्थान: आख़िर नेताओं को याद आए आदिवासी

- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
वे आदिवासी हैं. कहीं नदी नालों का मुहाना, कहीं पहाड़ों की गोद तो कहीं घने जंगलों में उनका बसेरा है. चुनावों की मुनादी हुई तो नेताओं और सियासी दलों का दिल आदिवासियों पर आ गया.
राजनीतिक पार्टियों के प्रबंधक और रहनुमा जनजातीय बस्तियों की फेरी लगा रहे हैं. हर नेता कह रहा है वो और उसकी पार्टी आदिवासी समाज के सच्चे सेवक हैं.
मगर राजस्थान की राजनीति में नज़र रखने वाले कहते हैं कि जयपुर की सत्ता का रास्ता आदिवासी बस्तियों से होकर जाता है. कदाचित इसीलिए सहसा आदिवासियों के प्रति प्रेम उमड़ आया है.
राजस्थान में कांग्रेस पिछले पांच साल से सता में है, भाजपा वनवास काट रही है. लेकिन जब सिहांसन के लिए चुनावी जंग छिड़ी तो दोनों पार्टियों ने अपनी मुहिम का आग़ाज़ आदिवासी बहुल मेवाड़ से किया.
भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपनी सुराज रथ यात्रा इसी मेवाड़ के धार्मिक स्थल चारभुजा से शुरू की.
कांग्रेस ने इसके समानांतर 'सन्देश यात्रा' निकाली तो आदिवासी क्षेत्र को ज़्यादा अहमियत दी. कुर्सी के लिए दो दलों की जंग के बीच तीसरी शक्ति के बतौर उदय होने की कोशिश में लगे निर्दलीय सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने भी मेवाड़ में बहुतेरे दौरे किए हैं.
आदिवासियों की अहमियत
कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी ने राजस्थान में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इसी क्षेत्र से की. फिर भाजपा के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी ने मेवाड़ का दौरा किया और आदिवासियों से मुख़ातिब हुए.
हर दल और नेता आदिवासियों का हितैषी और हमदर्द होने की दुहाई दे रहा है. राजनीति के जानकार कहते हैं कि दरअसल इस क्षेत्र में विधानसभा की 28 और लोकसभा की चार सीटें हैं.
पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 20 सीटें जीतीं और बाद में लोकसभा की चारों सीटें उसकी झोली में आ गईं. लिहाज़ा दोनों दलों को लगता है कि आदिवासियों की हिमायत के बग़ैर जयपुर की सता हासिल नहीं सकती.
उदयपुर में राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संजय लोढ़ा कहते हैं कि आदिवासी अंचल पारंपरिक तौर पर कांग्रेस का साथ देता रहा है. लेकिन वर्ष 2003 और उससे पहले मंदिर आंदोलन के दौरान इस क्षेत्र में भाजपा को कामयाबी मिल गई.
वर्ष 2003 के विधानसभा चुनावों में इस अंचल से भाजपा ने मेवाड़ से मिले समर्थन के दम पर कांग्रेस को सता से बाहर कर दिया था. डॉ लोढ़ा कहते हैं, “ये स्वाभाविक ही है कि दोनों प्रतिद्वंदी दल मेवाड़ में ज़्यादा ज़ोर लगा रहे है.”
सिविल सेवा में जगह नहीं
कुछ जानकार कहते हैं कि मैदान और पहाड़ में फ़र्क़ है. नेताओं की जमात को लगता है कि धनुर्धारी आदिवासी भील भोला और सरल है. वो जल्दी प्रभावित हो सकता है. वो गुणा भाग नहीं करता. ये उसकी अच्छाई की शक्ति है.

वो महत्वाकांक्षी नहीं है. वो गोंद, कत्था और शहद जैसी वनोपज की दुनिया में बेफ़िक़्री से रहता है. उसकी तमन्नाओं का संसार छोटा है. राजनीतिक दल इसे अपने लिए मुफ़ीद मानते हैं. इसीलिए हर दल आदिवासी का दिल जीतने का यत्न कर रहा है.
भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी जब जब रथ पर सवार होकर निकले, उनके रथ के पहिए आदिवासी बहुल मेवाड़ होकर जरूर गुज़रे. इससे बीजेपी को इस अंचल में पैर पसारने में बड़ी मदद मिली. गुजरात की सरहद से लगे मेवाड़ में आदिवासियों की बहुतायत है.
विधानसभा की सत्रह और लोकसभा की दो सीटें जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं. इन आदिवासियों के लिए नौकरियों में आरक्षण है. लेकिन एक भी भील आदिवासी भारतीय सिविल सेवा में जगह नहीं हासिल कर सका है.
ये दलों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं. इस क्षेत्र में क़ीमती खनिज पत्थर निकलता है. मालिक कोई और है, आदिवासी खदानों पर महज मज़दूर हैं.
दक्षिणी राजस्थान के इस आदिवासी क्षेत्र का बचपन पड़ोस के गुजरात में बीटी कॉटन के खेतों में मज़दूरी करता मिलता है.
मगर ये चुनावी बहस का हिस्सा नहीं हैं.
कुछ नहीं बदला
जब भारत ग़ुलाम था, आदिवासी पहले सामंतों के सितम से लड़े और फिर गोविन्द गुरू की सरपरस्ती में अंग्रेज हुकूमत से लड़े.

दस्तावेज़ इतिहास हैं तो वो बताते हैं सात दिसंबर, 1908 को इसी अंचल के बांसवाड़ा ज़िले में जलियांवाला कांड से बड़ी घटना हुई. दस्तावेज़ के मुताबिक़ गोविन्द गुरू के नेतृत्व में जमा भीड़ पर हुकूमत की फ़ौज ने गोलियां चलाईं और इसमें डेढ़ हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. लेकिन शहादत का ये अफसाना ना पाठ्यक्रम का हिस्सा बना, न राजनीति के मंचों का.
आदिवासी अंचल में रंगीन पोस्टरों की बहार है. इन पोस्टरों में भुवन मोहनी मुस्कान के साथ नेताओं के चेहरे चस्पा है. बड़ी बड़ी गाड़ियां दौड़ रही हैं. नारों का कोलाहल पहाड़ी जनजीवन की ख़ामोशी पर ग़ालिब है.
सियासी रैलियों का ज़ोर है, क्योंकि कुछ समय के ही सही, आदिवासी समाज के प्रति नेताओं का प्यार उमड़ आया है. ये अनुराग मतदान के दिन तक जारी रहेगा.
इतिहासकार बताते हैं कि रियासतकाल में भील ही राजाओं का राजतिलक करते थे. वक़्त बदला, देश आज़ाद हुआ और नेता सता में आ गए.
मगर धनुर्धर भील की भूमिका में कोई बदलाव नहीं आया. पहले वे राजाओं का राजतिलक करते थे, अब नेताओं का. लेकिन आदिवासी अब भी वहीं है जहां पहले था.
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