लद्दाख फ़िल्म समारोह: जहाँ सर्दी, सिनेमा और सितारे हैं

- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लद्दाख से
कुछ साल पहले जब आमिर खान की फ़िल्म 'थ्री इडियट्स' आई थी तो जितनी चर्चा इस फ़िल्म की हुई थी, उतनी ही चर्चा फ़िल्म में दिखाई गई एक ख़ूबसूरत झील की हुई थी.
लद्दाख के इन्हीं ख़ूबसूरत नज़ारों के बीच हो रहा है लद्दाख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल जिसका आज आख़िरी दिन है. करीब 11 हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर हो रहे इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल की गिनती दुनिया में सबसे ऊँचाई पर होने वाले फ़िल्मी समारोहों में की जा सकती है.
<link type="page"><caption> लद्दाख फ़िल्म समारोह</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/09/130914_ladakh_film_festival_gallery_ar.shtml" platform="highweb"/></link>
यहाँ गीतकार गुलज़ार, विशाल भारद्वाज, अपर्णा सेन और मधुर भंडारकर जैसे दिग्गज पहुँचे हैं. ऊँचे पर्वत, ठंडी हवा और हर ओर सिनेमा की हलचल, जब मंजर इतना ख़ूबसूरत है तो गीतकार गुलज़ार भी इसके मुरीद हो गए.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "आप देखिए क्या ख़ूबसूरत नज़ारा है. इससे अच्छा क्या हो सकता है कि इतने मनमोहक माहौल में एक फ़िल्म उत्सव हो रहा है और अच्छी बात ये है कि हिंदी फ़िल्में अब लद्दाख जैसे सरहदी इलाक़ों तक पहुँच गई हैं."
गुलज़ार की फ़िल्मों का विशेष रेट्रोस्पेक्टिव भी यहाँ हो रहा है जिसमें उनके निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म 'मेरे अपने' भी दिखाई गई. गुलज़ार ने बरसों बाद ये फ़िल्म दोबारा अपने प्रशंसकों के बीच बैठकर देखी.
'सेलिब्रेटिंग वुमनहुड'

विशाल और गुलज़ार की जुगलबंदी कई फ़िल्मों में रही है और लद्दाख फ़िल्म फेस्टिवल में उनकी फ़िल्मों का रेट्रोस्पेक्टिव भी विशाल ने ही पेश किया. विशाल के बारे में गुलज़ार ने कुछ यूँ कहा, "विशाल इज़ लाइक माई सन, मेरे बेटे जैसे हैं. लाइक शब्द इसलिए कि मैं उन्हें पसंद करता हूँ. मुझे लगता है कि उनके ज़रिए मैं अपनी ज़िंदगी और कुछ साल जी रहा हूँ."
इस समारोह का एक थीम रहा है 'सेलिब्रेटिंग वुमनहुड' यानी 'महिलाओं के जज़्बे को सलाम'. इसके तहत 1940 की फ़िल्म 'डायमंड क्वीन' दिखाई गई जिसमें फ़ीयरलेस नादिया नाम से मशहूर मेरी इवान्स ने काम किया था. इसे लेकर लोगों में खासी उत्सुकता रही.
<link type="page"><caption> सिल्क रूट को दुनिया जानती है</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130913_hello_laddakh_diary_sk.shtml" platform="highweb"/></link>
वैसे ज़हन में ये सवाल आना लाज़मी है कि आख़िर लद्दाख जैसी जगह पर फ़िल्म फ़ेस्टिवल क्यों. ये इलाक़ा थोड़ा दुर्गम है, ठंड बहुत है और बड़े समारोहों के लिए बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं.
इस फ़ेस्टिवल के संस्थापक हैं युवा फ़िल्मकार मेल्विन विलियम्स. वे बताते हैं, "दरअसल हम कुछ साल पहले लद्दाख एक मलयालम फ़िल्म की शूटिंग करने आए थे. फिर यहाँ बाढ़ आई जिससे काफ़ी तबाही हुई. हमें लगा कि पर्यटक, फ़िल्मकार सब यहाँ आते हैं और चले जाते हैं लेकिन हमें लद्दाख के लिए कुछ करना चाहिए. चूँकि हम फ़िल्में बनाते हैं तो हमने फ़िल्म फेस्टिवल के बारे में सोचा. इस फेस्टिवल का मकसद लद्दाख की ओर ध्यान खींचना, पर्यटन को बढ़ावा देना और पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा उठाना भी है."
"यहाँ तीन दिन रहने के बाद ही मुझे एहसास हो गया कि लद्दाख में इस तरह का समारोह आयोजित करना आसान नहीं है. जहाँ पिछले साल तक खंडहर था वहाँ ऊँचे पहाड़ पर कुछ महीनों के अंदर थिएटर बनाया गया."
नहीं आए उमर

भारत के अन्य फ़िल्मकारों की रुचि भी धीरे धीरे लद्दाख को लेकर बढ़ रही है. मधुर भंडारकर कहते हैं, "ये बहुत ही अनोखा आयोजन है. शुरू में जब मैंने मुंबई में फ़िल्म उद्योग के साथियों से कहा कि मैं लद्दाख फ़िल्म फेस्टिवल जा रहा हूँ तो उन्होंने कहा कि मज़ाक तो नहीं कर रहे. क्या वहाँ ऐसा कोई आयोजन भी होता है."
<link type="page"><caption> लद्दाख में पर्यटन के नए शिखर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/06/100613_ladakh_peak_dps.shtml" platform="highweb"/></link>
इस आयोजन में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह को भी आना था पर आख़िरी मौके पर उनका दौरा रद्द हो गया. उनके कैबिनेट से आए मंत्री ने बताया कि ज़ुबिन मेहता के कन्सर्ट को लेकर इतना विवाद हो गया कि मुख्यमंत्री को इस सांस्कृतिक आयोजन से दूर रहना पड़ा.
वैसे इस समारोह के बहाने लद्दाख के फ़िल्म उद्योग को भी सुर्ख़ियों में लाने की मंशा है जिसका दायरा छोटा है. हालांकि यहाँ लोग बड़े चाव से लद्दाखी फ़िल्में देखते हैं पर कई चुनौतियाँ भी हैं.
लद्दाख के वरिष्ठ फ़िल्मकार चेतन बताते हैं, "यहाँ हम फ़िल्में बना तो रहे हैं लेकिन संसाधन कम हैं. लोगों के पास प्रशिक्षण नहीं है. अपना पैसा लगाते हैं. फ़िल्म दिखाने के लिए भी इंतज़ाम नहीं है."
एक ओर जहाँ लद्दाख के ख़ूबसूरत नज़ारे हैं तो एक तरफ फ़िल्में और फ़िल्मी सितारे. अगर आप सिनेमा और क़ुदरती नज़ारे दोनों के प्रशंसक हैं तो आप किसे तवज्जो दें आप एक बार तो सोच में पड़ जाएँगे.
फ़िल्म फेस्टिवल तो रविवार को खत्म हो जाएगा लेकिन स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इस बहाने उनके जीवन, उनकी मुश्किलें, उनकी फ़िल्मों पर लोग थोड़ा गौर करेंगे.
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