क्या मोदी के ख़िलाफ़ आडवाणी अकेले खड़े हैं?

- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद मोदी की ताजपोशी के समारोह में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी मौजूद नहीं थे. उन्होंने थोड़ी ही देर में एक पत्र जारी करके अपना दुख भी ज़ाहिर कर दिया.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा के भीतर इस फ़ैसले को लेकर आम सहमति है. सवाल ये भी है कि आडवाणी अकेले मोदी के विरोध में हैं या और भी कई वरिष्ठ नेता जैसे मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज या अनंत कुमार मोदी के ख़िलाफ़ खड़े है. और अगर ऐसा है तो ये कितने दिन चलेगा.
मोदी के नाम पर सहमति तो पहले भी बनी हुई थी सिवाय इसके की सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी उतने ख़ुश नहीं है, लेकिन वो मान जाएंगे ऐसा कल से ही अंदाज़ा लगाया जा रहा था.
हालांकि आडवाणी के बारे में जो संदेश था वो आख़िर तक सही साबित हुआ. केवल एक रहस्य की बात ये है कि आडवाणी इस बैठक के लिए घर से निकले तो लेकिन फिर वापस लौट गए. इसकी वजह अभी तक समझ में नहीं आई कि वो क्यों आ रहे थे बैठक में और अगर आ रहे थे तो वापस क्यों लौट गए?
भाजपा और आडवाणी के रिश्तों की बात करें तो, आडवाणी को भाजपा महत्व देती रहेगी. अब आडवाणी जी का ये ग़ुस्सा भर है या उनके पीछे पार्टी के अंदर कोई ताक़त है, ये देखने वाली बात होगी.
मोदी के रास्ते में 'अड़चनें'
अगर आडवाणी जी के साथ कुछ और लोग भी हैं तो इसका एक मतलब तो ये हुआ कि मोदी को काम करने में दिक्क़त होगी.
हो सकता है कि आडवाणी ये विरोध केवल सैद्धांतिक तरीक़े से विरोध दर्ज कराना चाहते हैं, ताकि अगर चुनाव के बाद मोदी अच्छा नहीं कर पाएं तो वो कह पाए कि उन्होंने पहले ही कहा था, लेकिन इस बारे में कोई साफ़-साफ़ बात भविष्य में ही पता चलेगी.

जहां तक बात है लालकृष्ण आडवाणी जी के राजनीतिक करियर की तो ये साफ़ कहा जा सकता है कि उनका ये चैप्टर तो पिछले आम चुनाव के बाद ही ख़त्म हो गया था.
दूसरी बात ये है कि उनकी उम्र अब उनका साथ नहीं दे रही है और 2014 के चुनाव में ही उनके लिए कोई संभावना हो सकती थी, लेकिन वो ज़िम्मेदारी अब मोदी को दे दी गई. तो इस प्रकार से आडवाणी अतीत में चले गए.
लेकिन जो कुछ भी समय आडवाणी के पास बचा है, उसमे वो मोदी को आशिर्वाद देंगे या दीर्घकालिक नाराज़गी रखेंगे, इस बारे में सफ़ाई कुछ दिनों में ही मिल पाएंगी.
(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी की बातचीत पर आधारित. ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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