पानी के लिए महाभारत की ओर बढ़ता शहरी भारत

- Author, हिमांशु ठक्कर
- पदनाम, पर्यावरणविद्, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष
चार साल पहले जुलाई के एक दिन कुछ लोग 300 किलोमीटर का सफ़र तय करके दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से मिलने आए थे.
उस दिन गर्मी थी और मैं भी उन लोगों के साथ था. हमें उम्मीद थी कि शीला दीक्षित हमारी बात सहानुभूतिपूर्वक सुनेंगी.
<link type="page"><caption> भारत का जल संकट</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/06/120629_india_water_crisis_slideshow_sy.shtml" platform="highweb"/></link>
हम उन्हें ये बताना चाहते थे कि दिल्ली सरकार और वे जिस रेणुका बांध के लिए पैरवी कर रही हैं, वो यमुना की सहायक गिरि नदी, पर्यावरण और हज़ारों लोगों के लिए तबाही का सबब बनने जा रहा है.
हम उनसे कहना चाहते थे कि दिल्ली के पास पानी की ज़रुरत को पूरा करने के लिए इस विध्वंसकारी, महंगी और राज्यों के बीच विवाद में फंसी परियोजना से बेहतर, सस्ते और तेज़ी से नतीजे देने वाले विकल्प हैं.
इस पर दिल्ली की मुख्यमंत्री ने जो जवाब हमें दिया वो न सिर्फ हमारे लिए अप्रत्याशित ही था बल्कि विचित्र भी था.
उन्होंने कहा कि दिल्ली केवल पानी का खरीददार है और हिमाचल प्रदेश ये पानी दिल्ली को बेच रहा है. अगर किसी को इस परियोजना से कोई समस्या है तो जाकर पानी बेचने वाले से बात करे, उन्हें परेशान न करे!
पानी की खपत

उसके बाद शीला दीक्षित बेकरार दिखाई दीं. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा, "दिल्ली को पानी के नए स्रोत की तत्काल ज़रुरत है और इसके लिए रेणुका बांध जितनी जल्दी हो सके तेज़ी से बने."
फिर चाहे कितनी भी बर्बादी, विस्थापन और जंगलों का नाश क्यों न हो या कोई भी रकम न खर्च हो. यहाँ तक कि शीला दीक्षित परियोजना पर जोर देने के लिए प्रधानमंत्री से भी मिलीं.
<link type="page"><caption> गुड़गाँव बना अमीरों की झुग्गी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/07/120723_gurgaon_rise_part1_sy.shtml" platform="highweb"/></link>
चार सालों के बाद भी रेणुका बांध को न तो कानूनी मंज़ूरी ही मिल पाई है और न ही राज्यों के बीच कोई समझौता हुआ है. बांध बनना या दिल्ली को पानी मिलना तो दूर की बात है.
उद्योग जगत की नुमाइंदगी करने वाली संस्था सीआईआई की हाल में हुई एक बैठक में इन्हीं मुख्यमंत्री का दिया बयान इस सिलसिले में दिलचस्प था.
उन्होंने कहा, "दिल्ली में प्रति व्यक्ति पानी की खपत देश भर में सबसे ज़्यादा है. शायद ये दुनिया भर के सबसे ज़्यादा पानी खपत करने वाले शहरों में से एक है. यहां पानी की प्रति व्यक्ति खपत 272 लीटर है. ये एक तरह की बर्बादी है.... पानी की खपत में कटौती किए जाने की ज़रूरत है."
पानी को लेकर दिल्ली की मुश्किल से इस बात के संकेत मिलते हैं कि पानी की कमी साफ तौर पर एक समस्या है.
पानी का संकट

वास्तव में अपने 15 साल के कार्यकाल की समीक्षा में शीला दीक्षित ने ये स्वीकार किया कि यमुना नदी की गंदगी उनकी सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है.
दिल्ली की सरकार पर यमुना नदी की सफाई को लेकर न्यायपालिका का भी दबाव है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का भी दबाव है जो भूजल और यमुना और उसके आसपास की उस ज़मीन के बेहतर प्रबंधन के लिए सरकार को कह रहा है जहां तक बाढ़ का पानी पहुंचता है.
<link type="page"><caption> सूखे की आशंका से घबराई सरकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/07/120723_drought_pmo_sm.shtml" platform="highweb"/></link>
और दिल्ली अकेली नहीं है. बैंगलोर पर भी झीलों की बेहतर देख-रेख के लिए न्यायपालिका का दबाव है. गुड़गांव ने नालियों से बहने वाले पानी को साफ़ करके उसका दोबारा इस्तेमाल शुरू कर दिया है.
चेन्नई ने एक अच्छी नजीर पेश की है कि बारिश के पानी को किस तरह इकट्ठा कर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि भारत का शहरी क्षेत्र पानी के संकट से जूझ रहा है. बढ़ते शहरीकरण और शहरी इलाकों में प्रति व्यक्ति पानी की बढ़ती खपत के साथ इन जगहों पर पानी का इस्तेमाल बढ़ने जा रहा है.
शहरी भारत में पानी के संकट की समस्या कमोबेश वैसी ही है जिससे दिल्ली को जूझना पड़ रहा है. भूजल के स्रोत सूखते जा रहे हैं, पानी का बिल बढ़ रहा है.
पानी का प्रबंधन

हालांकि यमुना के आसपास की ज़मीन, स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण और बारिश के पानी के दोबारा इस्तेमाल, भूजल के स्तर को बढ़ाने की कोशिशों के बारे में बात की जा रही है.
लेकिन ज़मीनी कार्रवाई के नाम पर बहुत थोड़ा ही हो रहा है. दिल्ली के पास गंदे पानी को साफ करने की सबसे ज़्यादा स्थापित क्षमता है. लेकिन ये अपनी आधी क्षमता के बराबर भी काम नहीं कर रही है.
<link type="page"><caption> कोका कोला के प्लांट पर गुस्सा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130420_coca_cola_plant_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
मॉनसून आने पर हम बाढ़ से जूझते हैं और गर्मी आने पर हमें पानी की ज़बरदस्त कमी से दो चार होना पड़ता है.
एक ओर जहाँ अमीर लोगों को गोल्फ़ क्लब और स्वीमिंगपूल के लिए पानी की कोई कमी नहीं होती वहीं दूसरी ओर लाखों गरीब लोगों को रोज़ाना प्रति व्यक्ति 20 लीटर पानी भी उपलब्ध नहीं होता.
शहरी क्षेत्रों में पानी के प्रबंधन को ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता जबकि यही समस्या का हल है.
ज़्यादा बुनियादी सुविधाएं, ज़्यादा तकनीक, ज़्यादा पैसा, निजीकरण और दूर के स्रोतों से ज़्यादा पानी जैसे तात्कालिक उपायों को जल प्रबंधन के लोकतांत्रीकरण पर तरजीह दी जा रही है.
निजीकरण की कोशिश

इसलिए उज्जैन नर्मदा को क्षिप्रा नदी से जोड़े जाने का इंतजार कर रहा है. मुंबई को दमनगंगा-पिंजल से मिलने वाले पानी का इंतज़ार है. कर्नाटक के नेता येत्तिनहोल परियोजना के जरिए नेत्रवती का पानी मोड़ने के लिए दबाव बना रहे हैं.
<link type="page"><caption> गंगा एक्शन प्लान पर सवाल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/11/101112_ganga_panchayat_vv.shtml" platform="highweb"/></link>
नरेंद्र मोदी भी इसी नाव पर सवार हैं. अहमदाबाद में साबरमती में नर्मदा का पानी गैरवाजिब तरीके से मिल रहा है जो कि कच्छ और सौराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए था. सरकारें पानी की आपूर्ति पर ज़्यादा जोर देती हैं, उन्हें ये तरीका पसंद आता है क्योंकि इसमें बहुत ज़्यादा पैसा है.
आठ साल पहले दिल्ली में पानी की सप्लाई के पूरे निजीकरण की एक कोशिश की गई थी. इसे विश्व बैंक और योजना आयोग का समर्थन मिला हुआ था. लोगों के ज़बरदस्त विरोध के बाद इस कदम को रोक लिया गया था.
निजीकरण की रणनीति को किस्तों में लागू करके अब यही कोशिश दोबारा हो रही है. कई जगहों पर इसे लागू करने की कोशिश की जा रही है, कर्नाटक का उदाहरण सबके सामने है.
24 घंटे पानी की आपूर्ति की बात इस कोशिश का नया चेहरा है. पानी के निजीकरण के अभियान के लिए यह नई प्रेरणा है. लेकिन हमारे पास ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ पानी के निजीकरण को सफलता मिली हो, जहाँ बराबरी के साथ गुणवत्ता युक्त पानी वाजिब कीमतों पर मुहैया कराया जा रहा हो.
लोकतांत्रिक इस्तेमाल

नौ सितम्बर 2013 के टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के पहले पन्ने की रिपोर्ट कहती है, "सबसे बुरी तरह से प्रभावित शहर जमशेदपुर है." जमशेदपुर में पानी की आपूर्ति का इंतज़ाम भारत में सबसे पहले निजी हाथ में दिया गया था.
<link type="page"><caption> गंगा में आचमन तक मुश्किल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/01/130112_kumbh_spl_ganga_rdt_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>
मालूम पड़ता है कि हमने इस बात की पड़ताल की कोशिश ही नहीं की है कि निजीकरण से किस हद तक कामयाबी मिल पाई है.
लेकिन भारत की राष्ट्रीय जल नीति-2012 पानी के निजीकरण के मुद्दे को आगे करने की कोशिश करती है. इसकी दिलचस्पी पानी के लोकतांत्रिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने में बहुत कम है.
वे लोग जो पानी को बाज़ार के एक उत्पाद के तौर पर देखते हैं और जो इसे बुनियादी ज़रूरत के रूप में मानते हैं, उनमें संघर्ष जारी है.
इस बीच अमीरों के बीच पानी के बढ़ते इस्तेमाल के बुरे असर के नतीजे के तौर पर शहरों और उसके आस पास के इलाकों में रहने वाले ग़रीब लोगों को मात्रा, गुणवत्ता और कीमत के लिहाज से पानी की बदतर आपूर्ति का सामना करना पड़ रहा है.
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