हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता
- Author, अशोक वाजपेयी
- पदनाम, साहित्यकार
मेरे जैसे निर्लज्ज कविता प्रेमी के लिए एक कविता का चुनाव करना तो बहुत मुश्किल है. लेकिन मेरी बहुत प्रिय कविताओं में से एक कविता है शमशेर बहादुर सिंह की ‘उषा’.

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है) बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से कि धुल गयी हो स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो । और... जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है। (कविता संग्रह – ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ से)
अव्वल तो ये कविता मुझे इसकी ऐंद्रिय संक्षिप्ति के कारण पसंद है. यानी इसमें जो दृश्य है, उसका बखान जिस तरह से किया गया है वो बहुत ही संश्लिष्ट क़िस्म का बखान है.
और उसमें एक लगभग कॉस्मिक घटना जो कि उषा का होना है यानी सूर्योदय हो रहा है. इसको एक बहुत ही घरेलू बिम्ब से अभिव्यक्त किया गया है.
‘रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’- एक तो सुबह का आकाश, लग रहा है नीला शंख जैसे – ये तो एक विराट सा बिम्ब हुआ. लेकिन उसके साथ ही ‘राख से लीपा हुआ चौका अभी गीला पड़ा है’ – यानी एक कॉस्मिक बिम्ब को एक बिल्कुल घरेलू बिम्ब में आसानी से बदल दिया गया है.

आगे यही एक घरेलूपन और चलता है. ‘बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से कि धुल गयी हो या स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने’ – ये सभी घरेलू बिम्ब हैं. यानी राख से लीपा हुआ चौका, बहुत काली सिल, स्लेट या लाल खड़िया चाक. ये बिल्कुल मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बिम्ब हैं. लेकिन इनके साथ-साथ एक शास्त्रीय सौन्दर्य की भी छवि इसमें है.
कवि अंत में ये कहता है सब जादू टूटता है जैसे खड़िया से लिखे गए बिम्ब मिट जाते हैं. जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है. मैं समझता हूं कि हिंदी में सूर्योदय का वर्णन करनेवाली ये संभवत: श्रेष्ठ कविता है.
सूर्योदय एक विराट घटना होती है क्योंकि हम उसको क्षितिज पर आर-पार, इधर से उधर बहुत दूरी तक देखते हैं. लेकिन शमशेर जी ने उसको बिल्कुल घरेलू बिम्ब में बदलकर एक आत्मीय ढंग से अपने में सूर्योदय होने देना – ये कविता की बहुत बड़ी विशेषता है. शमशेर बहादुर सिंह हिंदी में संभवत: सौंदर्य के बहुत बड़े कवि रहे हैं. और इसमें भाषा, बिम्ब और लय – तीनों का एक अद्भुत, आदर्श संतुलन है. इसीलिए ये कविता मुझे बेहद पसंद है. काश मैं ऐसी कविता कभी लिख पाता.
(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)
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