मेरी प्रिय कविता: बद्री नारायण

- Author, बद्री नारायण
- पदनाम, साहित्यकार
हिन्दी में किसी एक कविता का चयन एक कालजयी, सर्वप्रासंगिक एवं सर्वग्राही कविता के रूप में करना बहुत कठिन है.
हिन्दी कविता मेरे अनुसार अमीर ख़ुसरो, कबीर, तुलसी, रविदास, शिवनारायण, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध जैसे कवियों की महान परंपरा से गुज़रते हुए आज के समकालीन कवियों यथा केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, अरुण कमल, अनामिका, नवल शुक्ल जैसे कवियों तक पहुंचती है.
हालांकि किसी एक कविता की प्रासंगिकता एवं उसकी कालजयी प्रवृत्ति का चयन प्राय: वर्तमान के संदर्भ में ही संभव हो पाता है. समय से परे होकर किसी प्रासंगिकता का चयन संभव नहीं है.
मेरे अनुसार वर्तमान सन्दर्भ में मध्यकालीन कवि कबीर प्रासंगिक भी हैं और कालजयी तो हैं ही. आज का समय बाज़ारवाद, धनसंचय, लोभ-लालच, भ्रष्टाचार की आक्रामक प्रवृत्तियों से ग्रसित है.
भूमण्डलीकरण एवं बाज़ारवाद से उभरी इस प्रवृत्ति को आगामी समय में बढ़ते ही जाना है. ऐसे में कबीर के दोहे एवं कविताएं जो धन संचयन, लोभ लालच पर आक्रमण करती हैं, मुझे बहुत प्रासंगिक प्रतीत होती हैं.
कबीर की एक कविता है – रहना नहीं देस बिराना है. यह कविता मेरे अनुसार अतीत में भी और आज भी कालजयी गुणों से युक्त है, सर्वग्राही है व प्रासंगिक तो है ही. कबीर कहते हैं कि लोभ-लालच, लिप्सा, कामना से युक्त यह संसार क्षणभंगुर एवं निस्सार है -
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े गल जाना है।
यह संसार काँट की बारी, उलझ पुलझ मरि जाना है।।
यह संसार झाड़ और झाखर, आग लगे बरि जाना है।
कहें कबीर सुनो भाई साधो, सद्गुरु नाम ठिकाना है।।
यह देश अपना देश नहीं है. यह काग़ज़ की पुड़िया की तरह है, पीनी की एक बूँद पड़ी नहीं कि गल जाएगा अर्थात् बहुत नश्वर है. यह संसार काँटों का बगीचा है, इसमें जो उलझा, वह उसी में फँसकर मर जाएगा.
लोभ-लालच, भ्रष्टाचार से धन कमाने एवं उपभोग की बढ़ती हुई प्रवृत्ति की कबीर निर्मम आलोचना करते हैं और इस आलोचना से संतोष व आत्मिक सुख पर टिका हुआ संसार बनाना चाहते हैं. इसीलिए वो कहते हैं –
चाह मिटी, चिन्ता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह है शहंशाह।।
(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)
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