भारतीय अर्थव्यवस्था की कहानी फिर से लिखने की चुनौती

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    • Author, रोहित बंसल
    • पदनाम, आर्थिक मामलों के जानकार

रघुराम राजन ने भारत के रिज़र्व बैंक के गर्वनर का दायित्व संभाल लिया है और पद संभालते ही उन्होंने माना कि घाटे की खाई को पाटना एक बड़ी चुनौती है.

<link type="page"><caption> रघुराम राजन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130809_raghuram_rajan_rbi_ap.shtml" platform="highweb"/></link> अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में मुख्य अर्थशास्त्री, भारत के प्रधानमंत्री के सलाहकार और वित्त मंत्रालय में मुख्य <link type="page"><caption> आर्थिक सलाहकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130830_indian_economy_ar.shtml" platform="highweb"/></link> के रूप में अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभा चुके हैं.

एक ओर जहां उनके पास विश्व स्तर का अनुभव है तो दूसरी ओर उन्होंने वित्त मंत्रालय में रहने के कारण वहां जमीनी स्तर पर काम किया है.

इसलिए यह कहा जा सकता है कि रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गर्वनर पद की नई जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह तैयार हैं. मानसिक तौर पर भी और बौद्धिक तौर पर भी.

अर्थव्यवस्था का महानायक

मुद्रास्फीति बढ़ने के साथ ही साथ, डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में गिरावट लगातार जारी है. इन हालात का मुकाबला करने के लिए राजन को योजना बनाने, उन्हें लागू करने और ठोस कदम भी उठाने की जरूरत पड़ेगी.

<link type="page"><caption> अर्थव्यवस्था</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130831_economy_pranjoy_ia.shtml" platform="highweb"/></link> के कई महानायक होते हैं. उनमें से एक महानायक होता है, रिजर्व बैंक का गर्वनर.

आरबीआई के गर्वनर के साथ वित्त मंत्री, योजना आयोग का उपाध्यक्ष और कुछ हद तक प्रतिपक्ष भी होता है. ऐसा प्रतीत होता है कई सालों से इन सभी के साथ राजन के रिश्ते मधुर हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था की कहानी फिर से लिखे जाने की जहां तक बात है, तो कोई दो राय नही कि इसमें केवल रिजर्व बैंक की ही भूमिका नहीं होगी, बल्कि समन्वय और विकास की नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होगा.

दबाव से परिचित

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इमेज कैप्शन, तीन सालों तक अपनी स्वायत्ता बरकरार रखना आरबीआई गर्वनर की महत्वपूर्ण भूमिका है.

चुनाव के पहले सरकार का अपना खर्च बढ़ा लेना और देश में हैसियत से ज्यादा खर्च करना, इन सब वजहों से रुपए के ऊपर दबाव बढ़ना लाजिमी है.

राजन से पहले गवर्नर रहे डी. सुब्बाराव ने भी अपने अंतिम भाषण में कहा था, "कई बार हम पर दबाव पड़ते थे." इस दबाव से रघुराम राजन भली भांति परिचित हैं.

डी सुब्बाराव की तरह के हालात रघुराम राजन के भी हैं. उन्हें भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे. बावजूद इसके कि ये कदम शायद पसंद नहीं किए जाएं.

आरबीआई के गर्वनर की हैसियत से रघुराम राजन यदि बैंक दर कम करते हैं तो आम आदमी नाराज होगा. यदि वे बैंक दर बढ़ाते हैं, तो उद्योग जगत नाराज होगा. इसमें तालमेल बिठाना राजन के लिए चुनौती भरा होगा.

इसके अलावा, चुनाव से पहले जो सरकार का आवेग होता है, उसे भी नियंत्रित करना जरूरी होगा.

एक पेशेवर होने के नाते तीन सालों तक अपनी स्वायत्ता बरकरार रखना, आरबीआई गर्वनर की कुछ महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से हैं.

(बीबीसी संवाददाता अनुभा रोहतगी के साथ की गई बातचीत पर आधारित)

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