उत्तराखंड में बाढ़: जानें बचीं, जिंदगियाँ हो गईं तबाह

उत्तराखंड में बाढ़

उत्तराखंड <link type="page"><caption> आपदा में गई जानों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130620_uttarakhand_shalini_ss.shtml" platform="highweb"/></link> का हिसाब अभी नहीं लग सका है. <link type="page"><caption> विनाश की तस्वीरें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130619_flood_north_india_aa.shtml" platform="highweb"/></link> देश का दिल झकझोर रही हैं. चार धाम यात्रा पर गए तीर्थयात्रियों को सुरक्षित निकालने के लिए <link type="page"><caption> सेना युद्धस्तर पर जुटी है</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/06/130620_uttarakhand_flood_rescue_operation_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link>.

प्रशासन की प्राथमिकता किसी भी तरह फंसे हुए लोगों की जान बचाना है. ऐसे में हजारों लोग ऐसे भी हैं जिनकी जान तो बच गई है लेकिन जिंदगी बाढ़ के पानी के साथ बह गई है.

इन लोगों के जीवन पर प्राकृतिक आपदा का गहरा असर हुआ है. केदारनाथ घाटी में हुए विनाश के कारण यात्रा कम से कम एक साल तक शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं है और यह नाउम्मीदी पर्यटन के ज़रिए जीवन यापन करने वाले लोगों पर भारी पड़ रही है.

उत्तराखंड के स्थानीय निवासियों के जीवन पर इस आपदा का गहरा असर हुआ है. नदी किनारे स्थित गांवों ने सबसे ज्यादा विनाश देखा है. बाढ़ में पुल बह जाने के कारण सैकड़ों गांव बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट गए हैं.

बीबीसी हिंदी ने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित गांवों के लोगों से संपर्क स्थापित किया और जाना उनके गांव का हाल.

'58 साल में नहीं देखे ऐसे हालात'

ग्राम पंचायत इंद्रपुरी के सचिव बुद्धिपाल सिंह रावत ने बताया, "सबसे बड़ी दिक्कत यातायात की है. पुल टूट जाने के कारण मुख्य मार्ग से कटे गांवों में पानी और खाने के सामान की काफ़ी परेशानी हो रही है. तीर्थयात्रा मार्ग पर बनी दुकानें बह जाने के कारण रोजगार समाप्त हो गया है. अपने 58 वर्ष के जीवन में मैंने यहां कभी ऐसे हालात नहीं देखे हैं. ऊपर वाले का शुक्र है कि आपदा दिन के वक्त आई. लोग किसी तरह अपनी जान तो बचा पाए लेकिन सामान सब बह गया. लोगों की जान बची है, ज़िंदगी जीने का ज़रिया बह गया है."

'जान बची, जिंदगी तबाह'

उत्तराखंड में बाढ़

रुद्रपयाग जिले से 24 किलोमीटर दूर स्थित चंद्रापुरी बाजार से बात करते हुए लेखपाल संतोष कुमार ने बताया, "यहां 66 मकान पूर्ण रूप से बह गए हैं, उनका कोई निशान भी नहीं बचा है. नौ मकान आधे क्षतिग्रस्त हुए हैं जबकि नदी किनारे स्थित अधिकतर मकान खतरे की जद में हैं. मेरे हलके में 21 गांव आते हैं जिनमें से मंदाकनी नदी किनारे स्थित बटबारी सोनार गांव, गबनी गांव और बचवार चक गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं."

"सबसे ज्यादा दिक्कत यातायात और बिजली की है. पीने के पानी की लाइनें टूट गई हैं जिससे पानी की दिक्कत पैदा हो गई है. गुरुवार को हरिद्वार से राहत सामग्री पहुंची जिसे बांट दिया गया है. नदी किनारे स्थित गाँवों के लोग अब ऊपर स्थित गाँवों में अपने रिश्तेदारों के घर चले गए हैं. उनकी संपत्ति नष्ट हो गई है. सबसे ज्यादा असर यात्रा रुक जाने का होगा. यातायात न होने के कारण दुकानों में भी सामान नहीं है. बिजली न होने के कारण फोन भी चार्ज नहीं हो पा रहे हैं. सामान की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है."

'दुकानों में सामान नहीं'

उत्तराखंड में बाढ़

केदारनाथ से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम धारकोट की प्रधान प्रभा देवी ने बताया, "यहां जानें तो नहीं गई हैं लेकिन अलकनंदा नदी पर बने मु्ख्य पुल के टूट जाने के कारण बाहरी दुनिया से संपर्क कट गया है. 14 गांव पूरी तरह से मुख्य मार्ग से कट गए हैं. मोटर मार्ग पूरी तरह टूट जाने के कारण खाद्य सामग्री नहीं पहुंच पा रही है."

"बीमार लोगों का इलाज नहीं हो पा रहा है. दुकानों पर भी सामान उपलब्ध नहीं है. लोग 15 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्यमार्ग स्थित बाजार तक पहुंच रहे हैं लेकिन वहां भी उन्हें सामान नहीं मिल पा रहा है. जब तक पुल नहीं बनेगा तब तक लोगों का जीवन दूभर रहेगा. यात्रा बंद होने के कारण रोजगार न होने से हालात और मुश्किल होंगे."

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