खाद्य सुरक्षा बिल पर विशेष संसद सत्र की तैयारी

भारत सरकार <link type="page"><caption> खाद्य सुरक्षा विधेयक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/story/2008/04/080425_kaushik_basu.shtml" platform="highweb"/></link> को पारित करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है ताकि देश की दो तिहाई आबादी को सब्सिडी वाला अनाज मुहैय्या कराया जा सके.
देश के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि इसके लिए सरकार विपक्षी दलों का समर्थन हासिल करने के लिए उनसे संपर्क करेगी.
उन्होंने कहा, "सरकार की मंशा इस विधेयक को संसद के विशेष सत्र में पारित कराने की है. इसके लिए हम विपक्षी दलों का समर्थन हासिल करने की एक और कोशिश कर रहे हैं ताकि इस विधेयक को पारित किया जा सके."
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार जितनी जल्दी हो सके संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहती है ताकि इस बिल को पारित किया जा सके.
केंद्र सरकार के इस क़दम पर प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने कहा है कि विधेयक को टाल दिया जाना अच्छी बात है.
पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा, "इसे संसद के मॉनसून सत्र में पेश किया जाना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी कुछ संशोधनों के साथ चाहेगी कि खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पारित हो."
खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत <link type="page"><caption> भोजन को क़ानूनी अधिकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130604_waste_food_mgt_ar.shtml" platform="highweb"/></link> बनाने का प्रस्ताव है जिससे देश के 80 करोड़ ग़रीबों को पांच किलोग्राम अनाज हर महीने सस्ती क़ीमत पर मिल सकेगा.
खाद्य सुरक्षा विधेयक को इस साल पहले भी संसद में पेश किया गया था लेकिन उस पर चर्चा नहीं हो सकी.
चुनावी वादा
खाद्य सुरक्षा बिल सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का चुनावी वादा है और संवाददाताओं का कहना है कि अगर ये लागू हो जाता है तो अगले साल होनेवाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को इसका फ़ायदा हो सकता है.
इस विधेयक के प्रस्ताव के मुताबिक ग़रीबों को तीन रुपए किलो चावल, दो रुपए किलो गेहूं और एक रुपए किलो बाजरा सरकारी राशन की दुकानों के ज़रिए वितरित करने की योजना है.
भारत में <link type="page"><caption> लाखों लोग ग़रीबी रेखा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/09/070909_kalahandi_corrupt.shtml" platform="highweb"/></link> के नीचे जीवन बसर करते हैं और बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
अगर ये योजना लागू होती है तो सरकारी ख़जाने पर हर साल एक अरब तीस करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा.

कांग्रेस नीत सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के आलोचकों का कहना है कि ये एक राजनीतिक क़दम है और इससे जनता के पैसे की बर्बादी होगी.
मतभेद
यूपीए सरकार और इसके सहयोगियों में भी इस योजना को लेकर मतभेद हैं.
कई राजनेताओं ने इस विधेयक को अध्यादेश के ज़रिए लागू करने की निंदा की है. उनका कहना है कि इसे संसद से पारित होने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए.
सीपीएम नेता नीलोत्पल बसु ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि, "एक विधेयक जो राष्ट्रीय जीवन के लिए इतना अहम है उसे अध्यादेश के ज़रिए लागू किया जा रहा है. ये शर्मनाक है और इससे संसदीय लोकतंत्र की खराब छवि सामने आती है."
हालांकि कृषि मंत्री के वी थॉमस ने कहा कि, "सरकार ने इस बिल पर चर्चा के लिए संसद के दो सत्रों का इंतज़ार किया है और इस तरह छह महीने का समय बीत गया है. लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है. विपक्ष अगर इसे लेकर गंभीर होता तो विधेयक पर चर्चा होने देता."
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